मार्केट में रिकवरी में ज्यादा समय नहीं लगता है। इतिहास बताता है कि 30-40 फीसदी गिरावट के बाद मार्केट को रिकवर करने में सिर्फ 2-3 साल का समय लगता है। इसके मुकाबले इनवेस्टर्स का आत्मविश्वास सुस्त रफ्तार से वापस आता है। फंड्स इंडिया के नए लॉन्ग टर्म मार्केट ड्राडाउन और रिकवरी डेटा के मनीकंट्रोल के एनालिसिस से यह जानकारी मिली है।
इनवेस्टर्स रिकवरी के बाद भी सावधानी बरतना जारी रखते हैं
एनालिसिस से पता चलता है कि उतार-चढ़ाव खासकर मिडकैप और स्मॉलकैप सूचकांकों में बार-बार देखने को मिला है, लेकिन लंबी अवधि में इसका निगेटिव असर शायद ही पड़ता है। लेकिन, इनवेस्टर्स रिकवरी के बाद भी सावधानी बरतना जारी रखते हैं। कोटक महिंद्रा एसेट मैनेजमेंट के एमडी निलेश शाह ने मनीकंट्रोल से बातचीत में कहा, "मार्केट में रिकवरी जल्द आती है, क्योंकि उसमें अर्निंग्स, लिक्विडिटी और भविष्य को लेकर उम्मीदों का हाथ होता है।"
इनवेस्टर्स रिकवरी कनफर्म होने तक इंतजार करते हैं
उन्होने कहा, "इनवेस्टर इनसान होता है। उसे रिकवरी से ज्यादा लॉस याद रहता है। इसलिए अच्छे नतीजों का मार्केट पर अच्छे असर के बावूजद वह सावधानी बरतना जारी रखता है।" उन्होंने कहा कि मार्केट में रिकवरी शुरू होने के बावूजद इनवेस्टर उसके कनफर्म होने तक इंतजार करना चाहता है। इस वजह से शेयरों की कीमतें काफी ऊपर जा चुकी होती हैं।
स्मॉलकैप-मिडकैप गिरावट के बावजूद लंबी अवधि में लॉस नहीं देते
फंड्सइंडिया के डेटा से यह भी पता चलता है कि इक्विटी खासकर मिडकैप और स्मॉलकैप सूचकांक काफी समय तक गिरावट दिखाते हैं, इसके बावजूद लंबी अवधि में उनमें लॉस कम ही देखने को मिलता है। शाह ने कहा, "कई इनवेस्टर्स उतार-चढ़ाव और लॉन्ग टर्म रिस्क को लेकर कनफ्यूज्ड रहते हैं। खासकर कम लिक्विडिटी और ग्रोथ को लेकर ज्यादा संवेदनशील में कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव सामान्य है। लेकिन, अच्छी क्वालिटी के शेयरों में लंबी अवधि में पूंजी को बड़ा नुकसान बहुत कम दिखता है। खासकर शेयरों में जितनी गिरावट दिखती है, उसके मुकाबले यह काफी कम रहता है।"
सात साल के पीरियड में निगेटिव रिटर्न नहीं दिखता है
फंड्सइंडिया की रिपोर्ट की एक खास बात यह है कि अलग-अलग मार्केट साइकिल में सात साल के पीरियड में निगेटिव इक्विटी रिटर्न नहीं दिखा है। शाह ने कहा, "इस डेटा से अलग-अलग साइकिल में निवेश बनाए रखने की ताकत का पता चलता है। करेक्शंस अच्छा नहीं लगता है, लेकिन इतिहास बताता है कि हर करेक्शन के बाद रिकवरी आती है और सूचकांक नई ऊंचाई पर पहुंच जाते हैं।" उन्होंने कहा कि इसके बावजूद धीरे-धीरे रिकवरी के मुकाबले मार्केट में गिरावट का ज्यादा असर सेंटीमेंट पर पड़ता है। गिरावट में डर बढ़ जाता है, जबकि रिकवरी का प्रोसेस शांत होता है।