अबक्कस एसेट मैनेजमेंट के संस्थापक सुनील सिंघानिया (Sunil Singhania, founder of Abakkus Asset Management) ने पीएमएस बाजार 7.0 शिखर सम्मेलन (PMS Bazaar 7.0 summit) में कहा, क्वालिटी किसी भी कीमत पर काम नहीं करती है और निवेशक को यह देखना चाहिए कि कंपनी कितनी आय ग्रोथ पेश कर सकती है। उन्होंने बताया कि अतीत में, 'क्वालिटी' के रूप में लेबल किया गया कोई भी स्टॉक फैंसी वैल्यूएशन पर कारोबार करता था। इस नैरेटिव ने निवेशकों को क्वालिटी शेयरों को इस हद तक प्राथमिकता देने के लिए प्रेरित किया कि वे भूल गए कि ये जरूरी नहीं कि हर अच्छी क्वालिटी वाली कंपनी का स्टॉक भी उतना ही अच्छा हो। उन्होंने कहा कि वैल्यूएशन कंपनी के रेवन्यू, ऑपरेटिंग मुनाफे और शुद्ध मुनाफे में वृद्धि के अनुरूप होना चाहिए।
उन्होंने हिंदुस्तान यूनिलीवर (Hindustan Unilever) और एशियन पेंट्स (Asian Paints) जैसी कंपनियों का उदाहरण दिया जिनके स्टॉक्स लगभग 75x से 80x के P/E रेशियो पर कारोबार कर रहे थे। इसे उचित ठहराया जा सकता था अगर ये कंपनियां सालाना 20 प्रतिशत की दर से बढ़ रही होतीं। जबकि उनकी विकास दर देश की जीडीपी से भी धीमी रही।
उन्होंने कहा कि ये कंपनियां अभी भी बेहतरीन कारोबार में हो सकती हैं लेकिन जरूरी नहीं कि इनके शेयर निवेश के लिए बेहतरीन स्टॉक भी हों।
उनका तर्क है कि निवेश के लिए सिर्फ कमाई ही सबकुछ नहीं है बल्कि P/E रेशियो भी मायने रखता है। P/E अनिवार्य रूप से बाजार की धारणा का प्रतिबिंब है। इसके लिए उन्होंने पारंपरिक अखबारों और टीवी चैनलों का उदाहरण दिया।
अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि इनकी बाजार में मजबूत स्थिति के बावजूद, उनका P/E रेशियो सिकुड़ गया है। इसकी वजह ये है कि नई पीढ़ी डिजिटल समाचार पढ़ने की ओर मुड़ गई है। इसी तरह, निवेशकों को अहम रूप से कमाई कराने वाली एकमात्र यात्री वाहन कंपनी होने के बावजूद, टेस्ला (Tesla) का बाजार पूंजीकरण (market capitalization) बीएमडब्ल्यू (BMW) जैसी स्थापित कंपनियों की तुलना में बहुत कम है। उन्होंने कहा, इससे पता चलता है कि भले ही कोई निवेशक भविष्य में उसको होनेवाले मुनाफे के अपने आकलन में सही हो, फिर भी घटते P/E रेशियो से उन्हें नुकसान झेलना पड़ सकता है।
सिंघानिया ने यह भी कहा कि कभी-कभी किसी शेयर के बारे में धारणा अस्थिरता के स्तर तक बढ़ सकती है। जिससे शेयरों की कीमत जरूरत से ज्यादा भी बढ़ जाती है। इसके विपरीत, ऐसे उदाहरण भी हैं जहां धारणा बहुत कम हो सकती है, जिसके परिणामस्वरूप स्टॉक का वैल्यूएशन कम हो जाता है। उन्होंने सुझाव दिया कि मुख्य बात ऐसी कंपनियों को ढूंढना चाहिए जहां कमाई में वृद्धि और धारणा दोनों एक लाइन में देखने को मिले। ऐसी कंपनियां लंबी अवधि के निवेश की सफलता के लिए सर्वोत्तम अवसर प्रदान करती हों।
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