ट्रंप प्रशासन ने माइक्रोसॉफ्ट, TCS और इंफोसिस समेत कई टेक कंपनियों के खिलाफ बड़ा कदम उठाया है। अमेरिका ने इन कंपनियों को एक इमिग्रेशन प्रोग्राम से सस्पेंड कर दिया है। प्रशासन का आरोप है कि इन कंपनियों ने वर्कर वीजा सिस्टम का बड़े पैमाने पर गलत इस्तेमाल किया।
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने गुरुवार को वॉशिंगटन में इसकी जानकारी दी। उन्होंने कहा कि दुर्भाग्य से अमेरिका में किसी कंपनी ने इस सिस्टम का माइक्रोसॉफ्ट से ज्यादा गलत इस्तेमाल नहीं किया है।
Infosys, Wipro और HCL भी कार्रवाई के दायरे में
अमेरिकी श्रम सचिव Keith Sonderling ने बताया कि Microsoft के अलावा कई दूसरी टेक कंपनियों पर भी कार्रवाई हुई है। इनमें Cognizant Technology Solutions, Infosys, TCS, Wipro, HCL Technologies और Capgemini शामिल हैं।
Sonderling ने कहा कि इस मामले में कई संघीय जांच चल रही हैं। जिस प्रोग्राम पर कार्रवाई हुई है, वह अमेरिकी कंपनियों को विदेशी कर्मचारियों के लिए स्थायी निवास यानी ग्रीन कार्ड स्पॉन्सर करने में मदद करता है।
ट्रंप प्रशासन क्यों सख्त हुआ?
ट्रंप प्रशासन लंबे समय से इमिग्रेशन सिस्टम पर सख्ती की बात करता रहा है। अब कानूनी और गैर-कानूनी दोनों रास्तों से होने वाले प्रवासन पर कार्रवाई बढ़ाई जा रही है।
H-1B वीजा प्रोग्राम भी लंबे समय से ट्रंप के समर्थकों के निशाने पर है। उनका कहना है कि इस प्रोग्राम से अमेरिकी कर्मचारियों के रोजगार के अवसर प्रभावित होते हैं।
ट्रंप समर्थक यह भी आरोप लगाते रहे हैं कि H-1B सिस्टम में बड़े पैमाने पर गलत इस्तेमाल होता है। इसी वजह से यह प्रोग्राम अमेरिकी इमिग्रेशन पॉलिसी की बहस में लगातार बना हुआ है।
कंपनियों के लिए क्या मतलब है?
इस फैसले से सबसे बड़ी चिंता विदेशी कर्मचारियों को अमेरिका में लंबे समय तक रखने की प्रक्रिया को लेकर है। ग्रीन कार्ड स्पॉन्सरिंग पर असर पड़ने से कंपनियों के लिए विदेशी कर्मचारियों की लॉन्ग टर्म प्लानिंग मुश्किल हो सकती है।
इसका असर खासकर उन भारतीय आईटी कंपनियों पर पड़ सकता है, जिनका अमेरिकी कारोबार बड़ा है और जो बड़ी संख्या में भारतीय टेक प्रोफेशनल्स को अमेरिका में भेजती हैं। हालांकि, इस फैसले का वास्तविक वित्तीय असर कितना होगा, यह आगे होने वाली संघीय जांच और सरकार के अगले कदमों पर निर्भर करेगा।
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