अमेरिका में महंगाई (Inflation) से राहत मिलने की लोगों की उम्मीद टूट गई है। अगस्त में रिटेल इनफ्लेशन (Retail Inflation) का आंकड़ा अनुमान से ज्यादा रहा। अमेरिका में हाई इनफ्लेशन उन लोगों के लिए भी संकट पैदा कर सकते हैं जो अमेरिका में नहीं रहते हैं।

अमेरिका में महंगाई (Inflation) से राहत मिलने की लोगों की उम्मीद टूट गई है। अगस्त में रिटेल इनफ्लेशन (Retail Inflation) का आंकड़ा अनुमान से ज्यादा रहा। अमेरिका में हाई इनफ्लेशन उन लोगों के लिए भी संकट पैदा कर सकते हैं जो अमेरिका में नहीं रहते हैं।
इनफ्लेशन के ताजा आंकड़ों को देखते हुए फेडरल रिजर्व (Federal Reserve) के चेयरमैन जेरोम पॉवेल (Jerome Powell) इंटरेस्ट रेट में अनुमान से ज्यादा वृद्धि कर सकते हैं। यह 'बीमारी से ज्यादा कड़वी उसकी दवा' जैसा होगा। फेडरल रिजर्व के रेट बढ़ाने का असर दुनियाभर में देखने को मिलेगा। कई देशों की इकोनॉमी ध्वस्त होने की कगार पर पहुंच जाएंगी।
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दूसरे देशों की इकोनॉमी में आई गिरावट का असर अमेरिकी इकोनॉमी की ग्रोथ पर भी पड़ेगा। हम ऐसे संकट की तरफ बढ़ सकते हैं जिसका हमें कोई अंदाजा नहीं है। ग्लोबल मार्केट की नजरें दो साल के अमेरिकी ट्रेजरी (बॉन्ड्स) की यील्ड पर होती हैं। अभी यह यील्ड डराने वाले लेवल पर पहुंच गई है। पिछले साल इस वक्त यह 0.2 फीसदी थी। अब यह 19 गुना ज्यादा है। यह फेडरल रिजर्व के हर महीने 95 अरब डॉलर क्वाटेंटिव टाइटेनिंग (लिक्विडिटी घटाने) शुरू होने से पहले है। दरअसल, फेडरल रिजर्व इंटरेस्ट रेट बढ़ाने के असर का अंदाजा नहीं लगा सका है।
कोई माने या न माने, डॉलर दुनिया की रिजर्व करेंसी है। ऐसे में ज्यादा इंटरेस्ट रेट के साथ लिक्विडिटी का असर हर व्यक्ति पर पड़ेगा चाहे वह दुनिया के किसी कोने में रहता हो। अमेरिका इनवेस्टर्स के लिए अमेरिका से बाहर किसी एसेट में इनवेस्ट करना फायदेमंद नहीं रह जाएगा। इससे दुनियाभर से पूंजी का पलायन शुरू हो जाएगा।
Bank of America का सर्वे मंगलवार को आया है। इसमें बताया गया है कि शेयरों को लेकर इनवेस्टर्स का सेंटीमेंट पहले कभी इतना ज्यादा कमजोर नहीं था। अगर आप प्रोफेशनल इनवेस्टमेंट स्ट्रेटिजिस्ट हैं तो डॉलर एसेट में निवेश बनाए रखने के लिए आपको फायर नहीं किया जाएगा। यह माइंडसेट कैसे बदलेगा यह बताना मुश्किल है।
जब दुनियाभर के इनवेस्टर्स मजबूत डॉलर की तरफ भागेंगे तो दूसरी इकोनॉमीज और मार्केट के लिए मुकाबला करना मुश्किल हो जाएगा। फेडरल रिजर्व के इंटरेस्ट बढ़ाने से कई देशों की करेंसी की हालत नाजुक हो गई है। जापान का उदाहरण लिया जा सकता है। येन में पिछले एक साल में डॉलर के मुकाबले 25 फीसदी से ज्यादा गिरावट आ चुकी है। यह 1990 के बाद अपने सबसे निचले स्तर पर है। जापान के केंद्रीय बैंक को अपनी करेंसी को गिरने से बचाने के लिए हस्तक्षेप करने को मजबूर होना पड़ा है। यह ट्रेंड जारी रहने की उम्मीद है।
चीन आम तौर पर अपनी करेंसी को कंट्रोल में रखता है। लेकिन, करेंसी में जरूरत से ज्यादा गिरावट आने पर चीन का सेंट्रल बैंक जरूरी कदम उठाने के लिए मजबूर होगा। उसने पिछले छह महीनों में युआन को 10 फीसदी से ज्यादा कमजोर होने दिया है। अगर अमेरिका में इनफ्लेशन बेकाबू रहता है तो चीन की करेंसी पर भी असर पड़न तय है। फेडरल रिजर्व की तरह यूरोपियन सेंट्रल बैंक और बैंक ऑफ इंग्लैंड न सिर्फ इंटरेस्ट रेट में बड़ी वृद्धि करने के बारे में सोच रहे हैं बल्कि वे बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडटी घटाने का भी प्लान बना रहे हैं। वे बॉन्ड पर्चेज प्रोग्राम को वापस ले लेंगे। यह सब एक साथ होगा।
सच्चाई यह है कि डिमांड में कमी लाने के लिए हर इकोनॉमी को इंटरेस्ट रेट बढ़ाने की जरूरत नहीं है। ग्लोबल इनफ्लेशन का बड़ा हिस्सा सप्लाई से जुड़ी बाधाओं की वजह से है। 2020 में कोविड की महमारी शुरू होने के बाद से दुनिया में बड़ा बदलाव आया है। इसने वैश्वीकरण की प्रक्रिया को भी नुकसान पहुंचाया है। इसके बावजूद फेडरल रिजर्व और दूसरे केंद्रीय बैंकों के रुख में बदलाव नहीं आया है।
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