सोने की लंका का आज बुरा हाल है। लोगों को खाने-पीने की चीजें नहीं मिल रही हैं। फ्यूल के लिए पेट्रोल पंप और गैस स्टेशनों पर लंबी लाइन लग रही है। हॉस्पिटल में दवाइयां नहीं हैं। लोग सरकार के खिलाफ सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं। कुछ प्रदर्शनों के उग्र होने की भी खबर है। सरकार को कुछ सूझ नहीं रहा। दरअसल, श्रीलंका आखिरकार चीन की डेट-ट्रैप डिप्लोमैसी का शिकार हो गया है।
चीन का शिकार बनने वाला पहला देश नहीं है श्रीलंका
चीन की डेट-ट्रैप डिप्लोमैसी का शिकार होने वाला श्रीलंका पहला देश नही है। इससे पहले लाओस इसका शिकार हो चुका है। क्या है चीन की डेट-ट्रैप डिप्लोमैसी, इसका क्या मकसद है, श्रीलंका इसका शिकार कैसे हो गया? इन सवालों के जवाब मुश्किल नहीं हैं। इसके लिए आपको सिर्फ थोड़ा पीछे जाना होगा। चीन के खतरनाक मंसूबों को समझना होगा। यह जानना होगा कि कैसे चीन कमजोर और आर्थिक रूप से गरीब देशों को अपने जाल में फंसाता है।
लाओस एक छोटा देश है। इसकी आबादी करीब 75 लाख है। इसकी सीमा म्यांमार, थाईलैंड, कंबोडिया, वियतनाम और चीन से लगती है। चीन ने लाओस में एक रेलवे लाइन बनाई है, जिसे चाइना-लाओस रेल नेटवर्क कहा जाता है। 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' (BRI) के तहत चीन ने लाओस के साथ इसे बनाने का समझौता किया। यह प्रोजेक्ट 6 अरब डॉलर का था। इसमें चीन की हिस्सेदारी 70 फीसदी थी।
इस रेल नेटवर्क प्रोजेक्ट में चीन की कई सरकारी और प्राइवेट कंपनियों ने काम किया। लाओस को अपने हिस्से का पैसा देने के लिए चीन के एक बैंक से 48 करोड़ डॉलर का लोन लेना पड़ा। सिर्फ 25 करोड़ डॉलर उसने अपने पास से लगाया। समझौते के मुताबिक, इस रेल प्रोजेक्ट का पूरा कर्ज चुकाने की जिम्मेदारी लाओस की थी।
इस प्रोजेक्ट की कॉस्ट इतनी बढ़ गई कि लाओस के कुल कर्ज में चीन की हिस्सेदारी 45 फीसदी तक पहुंच गई। कर्ज बहुत ज्यादा बढ़ जाने पर लाओस को सितंबर 2020 में अपने एक इलेक्ट्रिकल सिस्टम का कुछ हिस्सा चीन को बेचने को मजबूर होना पड़ा। इससे लाओस को 60 करोड़ डॉलर मिले। फिर रेल नेटवर्क शुरू होने के ठीक पहले लाओस को अपना एक दूसरा एसेट चीन को बेचना पड़ा। दरअसल, उसे चीन के बैंक से लिए कर्ज का पैसा चुकाना जरूरी था। अब इस रेल नेटवर्क पर एक तरह से चीन का मालिकाना हक है।
श्रीलंका को ऐसे बनाया अपना शिकार
अब जानते हैं कि श्रीलंका के साथ चीन ने क्या किया। 2009 से पहले तमिल विद्रोहियों से चल रही लड़ाई के दौरान चीन को इंडिया को नुकसान पहुंचाने का बड़ा मौका दिखा। उसने श्रीलंका की सरकार को हथियार देने शुरू किए। वहां इनवेस्टमेंट के लिए भी कदम बढ़ाएं। फिर संयुक्त राष्ट्र में श्रीलंका के पक्ष में अपने विटो तक का इस्तेमाल किया।
चीन ने श्रीलंका के हैम्बनटोटा बंदरगाह के विस्तार के लिए पैसे देने का वादा किया। दक्षिण श्रीलंका में स्थित यह पोर्ट सिटी राजापक्षा का घर है। चीन ने बैंकों ने इस प्रोजेक्ट के लिए श्रीलंका को 1 अरब डॉलर का कर्ज दिया। इस प्रोजेक्ट को पूरा करने के काम में कई चीनी कंपनियां शामिल हुई। राजापक्षा परिवार के कई सदस्यों पर इस प्रोजेक्ट से जुड़े करप्शन में शामिल होने के आरोप लगे।
धीरे-धीरे श्रीलंका पर चीन का कर्ज बढ़ने लगा। कर्ज चुकाने के लिए श्रीलंका ने चीन के बैंकों से नया लोन लिया। इसके बदले उसने हैम्बनटोटा बंदरगाह चीन के व्यापारियों को 99 साल के लीज पर देने के लिए तैयार हो गया। बताया जाता है कि चीन ने पिछले कुछ सालों में श्रीलंका को 12 अरब डॉलर के कर्ज दिए। अब श्रीलंका की स्थिति दुनिया के सामने हैं। वह पूरी तरह से लाचार आईएमएफ से मदद मिलने का इंतजार कर रहा है।
दरअसल, चीन आर्थिक रूप से कमजोर, कम इनकम और राजनीतिक अस्थिरता का सामना करने वाले देशों को अपने जाल में फंसाता है। 2020 तक कम इनकम वाले देशों पर चीन का करीब 170 अरब डॉलर का कर्ज था। यह लोन ज्यादातर बीआरआई और इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने से जुड़ा है। इनमें सड़क, रेल नेटवर्क, पोर्ट्स और एयरपोर्ट्स शामिल हैं।