8th Pay Commission: आठवें वेतन आयोग का मुंबई का दौरा खत्म हो गया है। दो दिन के दौर में आयोग के सदस्यों ने एंप्लॉयीज के प्रतिनिधियों और यूनियंस के सदस्यों की राय जानने की कोशिश की। इस बीच, कई एंप्लॉयीज यूनियंस ने डियरनेस अलाउन्स, डियरनेस रिलीफ और बेसिक पे को लेकर बड़े बदलाव करने की मांग की है। सवाल है कि क्या आयोग यह मांग पूरी करेगा?
डीए अभी बेसिक पे का 60 फीसदी
केंद्र सरकार के एंप्लॉयीज का डीए अभी बेसिक पे का 60 फीसदी है। यह इस साल 1 जनवरी को इस लेवल पर पहुंच गया था। दरअसल, डीए का मकसद इनफ्लेशन के असर को देखते हुए एंप्लॉयीज की सैलरी को बढ़ाना है। इसकी वजह यह है कि इनफ्लेशन की वजह से एंप्लॉयीज की कॉस्ट ऑफ लिविंग बढ़ जाती है। सरकार एक साल में डीए में दो बार बदलाव करती है। पहला बदलाव 1 जनवरी को होता है और दूसरा 1 जुलाई को होता है।
डीए कैलकुलेशन का फॉर्मूला
डीए के कैलकुलेशन के लिए एक फॉर्मूला है। इसे इंडस्ट्रियल वर्कर्स के ऑल इंडिया कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (AICPI-IW) के 12 महीनों के औसत में हुई वृद्धि के आधार पर कैलकुलेट किया जाता है। लेबर ब्यूरो AICPI-IW को पब्लिश करता है। खास बात यह है कि डीए बढ़ने पर ट्रांसपोर्ट अलाउन्स भी बढ़ जाता है। इसकी वजह यह है कि ट्रांसपोर्ट अलाउन्स डीए से लिंक्ड है।
डीए को लेकर यूनियंस की मांग
कई एंप्लॉयीज यूनियंस, एसोसिएशंस और पेंशनर्स ऑर्गेनाइजेशंस ने आठवें वेतन आयोग को डीए की मौजूदा व्यवस्था में बदलाव करने की सलाह दी है। फेडरेशन ऑफ नेशनल पोस्टल ऑर्गेनाइजेशंस (FNPO) का मानना है कि डीए 25 फीसदी पार कर जाने पर इसका विलय बेसिक पे में कर देना चाहिए। फेडरेशन का मानना है कि इससे केंद्र सरकार के एंप्लॉयीज को फायदा होगा।
अभी साल में डीए में दो बार संशोधन
भारत पेंशनर्स समाज का कहना है कि सरकार को साल में डीए में दो बार संशोधन करने की जगह डीए में हर तिमाही में संसोधन करना चाहिए। अगर आयोग इसकी सिफारिश करता है और सरकार इसे मान लेती है तो साल में डीए में दो बार की जगह चार बार संशोधन होगा। एंप्लॉयीज से जुड़े कुछ संगठनों का मानना है कि ऑल इंडिया कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स फॉर इंडस्ट्रियल वर्कर्स (AICPI-IW) की समीक्षा होनी चाहिए।
सरकार लेगी डीए में बदलाव का अंतिम फैसला
अनुमान है कि आठवें वेतन आयोग के तीन सदस्य डीए के मसले की समीक्षा करने के बाद सरकार को इस बारे में अपनी रिपोर्ट सौंपेंगे। उधर, सरकार डीए की व्यवस्था में किसी तरह की बदलाव की सिफारिश को मंजूरी देने से पहले यह सुनिश्चित करना चाहेगी कि उसकी वित्तीय स्थिति पर इस बदलाव का प्रतिकूल असर ना पड़े। क्रूड की कीमतें लगातार हाई लेवल पर बने रहने से पहले से ही सरकार पर वित्तीय दबाव बढ़ा है।