आजकल बैंक और वित्तीय संस्थान अपने ग्राहकों को टॉप-अप लोन का ऑफर बड़ी सहजता से देते हैं। अगर आपके पास पहले से होम लोन या पर्सनल लोन है और आपने समय पर किस्तें चुकाई हैं, तो बैंक आपको कम जोखिम वाला ग्राहक मानते हैं। ऐसे में वे बिना ज्यादा दस्तावेज मांगे, तुरंत अतिरिक्त रकम देने को तैयार रहते हैं। सुनने में यह बेहद आकर्षक लगता है जल्दी पैसा, आसान प्रक्रिया और एक ही EMI। लेकिन असलियत थोड़ी अलग है।
टॉप-अप लोन असल में नया कर्ज
इसे लेने से पहले यह समझना जरूरी है कि यह आपके वित्तीय बोझ को कैसे प्रभावित करेगा। अगर यह रकम जरूरी खर्चों जैसे मेडिकल इमरजेंसी, घर की मरम्मत या बच्चों की पढ़ाई के लिए है, तो यह मददगार साबित हो सकता है। लेकिन अगर इसका इस्तेमाल सिर्फ छुट्टियों, गैजेट्स या लग्जरी खर्चों के लिए किया जा रहा है, तो यह आपके EMI को खतरनाक तरीके से बढ़ा सकता है।
कई बार टॉप-अप लोन की ब्याज दर मूल लोन से थोड़ी ज्यादा होती है। 0.5% से 1% का फर्क भी लंबे समय में बड़ा असर डाल सकता है। साथ ही, बैंक अक्सर टेन्योर बढ़ा देते हैं ताकि EMI कम दिखे। लेकिन इसका मतलब है कि आप ज्यादा सालों तक ब्याज चुकाएंगे।
EMI और कैश फ्लो का संतुलन जरूरी है। नया EMI आपके मासिक बजट को बिगाड़ सकता है। अगर इससे आपकी SIP, इंश्योरेंस प्रीमियम या इमरजेंसी सेविंग प्रभावित होती है, तो यह सही कदम नहीं होगा।
इसके अलावा, प्रोसेसिंग फीस, GST और अन्य छिपे चार्जेज भी जुड़ सकते हैं। यह छोटे-छोटे खर्च मिलकर लोन को महंगा बना देते हैं। साथ ही, टॉप-अप लोन आपके क्रेडिट स्कोर और भविष्य की लोन पात्रता को भी प्रभावित करता है। अगर आगे कार लोन या एजुकेशन लोन लेना है, तो EMI-इनकम अनुपात बढ़ने से बैंक नया कर्ज देने से मना कर सकते हैं।
मान लीजिए एक परिवार मेडिकल इमरजेंसी में फंसा है और टॉप-अप लोन उन्हें तुरंत राहत देता है। वहीं दूसरी ओर, कोई व्यक्ति सिर्फ नई कार या विदेश यात्रा के लिए यह लोन लेता है और बाद में बढ़ते EMI के बोझ से परेशान हो जाता है। यही फर्क है जरूरत बनाम चाहत।