मदुरई निवासी 42 साल की अन्नपूर्णी थेवर अगस्त 2020 में कोरोना से ठीक हुईं हैं, लेकिन तब से लेकर अब तक वो हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी लेने के लिए संघर्ष कर रही हैं। उनको 2 इंश्येरेंस कंपनियों ने अपनी अंडर राइटिंग पॉलिसी का हवाला देते हुए पॉलिसी देने से इनकार कर दिया । जबकि अन्य इंश्योरेंस कंपनियों ने मार्केट रेट से ज्यादा 45-48 प्रीमियम की मांग की। अन्नूपूर्णी इस बात को लेकर परेशान है कि जब उनको डॉक्टर्स ने क्लियर बिल और हेल्थ का सार्टिफिकेट दे दिया है तो इंश्योरेंस कंपनियां उन्हें हेल्थ कवर देने से क्यों मना कर रही हैं।
आमतौर पर जब किसी कस्टमर को कोई लाइफ स्टाइल डिसीज जैसे डायबिटीज या हाइपरटेंशन होने की बात पता चलती है (पॉलसी खरीदने के बाद) तो उससे रिन्युअल के समय थोड़ा ज्यादा प्रीमियम लिया जाता है। यह प्रीमियम ऑटोमेटिक नहीं होता है, बल्कि यह इंश्योरर के पिछले क्लेम एक्सपीरियंस पर आधारित होता है।
वर्तमान में कोविड के मरीजों के मामले भारत पूरी दुनिया में दूसरे स्थान पर है। 1.5 करोड़ कोरोना पॉजिटिव केसों में करीब 1 करोड़ लोग देश में कोरोना से रिकवर हो चुके हैं। लेकिन उनके लिए हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी लेना मुश्किल हो गया है।
कोरोना मरीजों को लेकर इंश्योरेंस कंपनियों ने अपने रूल्स कड़े कर दिए हैं। इसका मतलब ये है कि जिनको कोविड-19 का संक्रमण हो चुका है। उनको जल्द ही पॉलिसी नहीं दी जाएगी और अगर दी भी जाएगी तो बहुत मोटे प्रीमियम पर दी जाएगी। कोरोना से रिकवर हुए कई मरीजों की शिकायत है कि उनको हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी देने से मना किया जा रहा है, जिसको देखते हुए IRDAI को इंश्योरेंस कंपनियों के खिलाफ कदम उठाते हुए उचित निर्देश जारी करना चाहिए। सूत्रों के मुताबिक इंश्योरेंस रेगुलेटर IRDIA इस मामले में अपनी नजर बनाए हुए हैं। कस्टमर भी प्राइसिंग और पॉलिसी के नियमों में एकरूपता चाहते हैं।
इंश्योरेंस कंपनियां पॉलिसी देने से क्यों बच रही हैं?
इंश्योरेंस कंपनियों से जुड़े सूत्रों ने मनी कंट्रोल को नाम की गोपनीयता बनाए रखने की शर्त पर बताया कि कोरोना से रिकवर हुए मरीजों के बारे में कठोर अंडर राइटिंग पॉलिसी की मुख्य वजह कंपनियों के लॉस रेशियो को नियंत्रण में रखना है। हम सभी कोरोना से रिकवर हुए मरीजों को पॉलिसी देने से मना नहीं करते। कोरोना से रिकवर हुए मरीजों को हेल्थ कवर देने की पॉलिसी में कड़ाई की वजह ये हो सकती है कि ऐसे लोगों में आगे चलकर फेफड़ों से जुड़ी बीमारी पैदा होने का ज्यादा जोखिम होता है। इसी वजह से इंश्योरेंस कंपनियां अपने लॉस रेशियो को नियंत्रण में रखने के लिए कोरोना मरीजों को लेकर नियमों को कड़ा कर रही है।
इसी तरह कोविड-19 से उबर चुके मरीजों में लंबी अवधि तक मांस पेशियों में दर्द की शिकायतें भी देखने को मिली हैं। इसको ध्यान में रखते हुए इंश्योरेंस कंपनियां मसल से जुड़ी बीमारियों को कोविड पेसेंट के कवरेज से बाहर कर रही हैं या फिर अतिरिक्त प्रीमियम के साथ राइडर जोड़ रही हैं।
लाइफ इंश्योरेंस के मामले में भी जो लोग कोविड पॉजिटिव पाए गए हैं, उनको या तो पॉलिसी देने से मना किया जा रहा है, या फिर उनसे मोटे प्रीमियम की मांग की जा रही है। डॉक्टर और दूसरे फ्रंटलाइन हेल्थ वर्कर को इंश्योरेंस कंपनियां 16 जनवरी से वैक्सीन लगने की शुरुआत होने की खबर के बावजूद हाई रिस्क कैटेगरी में रख रही हैं और उनको पॉलीसी देने से कतराती हैं।
इस तरह देखें तो कोरोना से जीत चुके लोगों का संघर्ष अभी खत्म होता नजर नहीं आ रहा है। उनको अपने लिए एक हेल्थ कवर या लाइफ इंश्योरेंस लेने के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ेगा। इन लोगों की मांग है कि मामले की गंभीरता को देखते हुए इंश्योरेंस रेगुलेटर को आगे आना चाहिए और इंश्योरेंस कंपनियों को निर्देश देना चाहिए कि वो सभी कस्टमर को पॉलिसी उपलब्ध करावाएं।
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