क्या बढ़ने वाली है आपकी EMI और महंगा होगा लोन? अगर ये नहीं संभला तो RBI दे सकता है बड़ा झटका

RBI Repo Rate Hike: क्या दुनिया भर में बढ़ रही ब्याज दरों का असर अब भारत की आपकी पॉकेट पर भी पड़ने वाला है? ब्रोकरेज फर्म मोतीलाल ओसवाल की नई रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका और यूरोप में रेट हाइक के बाद अगर कच्चा तेल महंगा बना रहा, तो RBI रेपो रेट में बढ़ोतरी कर सकता है। जानिए इसका आपके होम लोन और ईएमआई पर क्या असर पड़ेगा

अपडेटेड Sep 21, 2026 पर 1:08 PM
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अमेरिका, यूरोप और जापान इन तीनों प्रमुख केंद्रीय बैंकों ने सितंबर में अपनी ब्याज दरों में बढ़ोतरी की है

Global Rate Hike & RBI Repo Rate Impact: दुनिया भर में अब सस्ते ब्याज पर लोन मिलने का जमाना खत्म हो रहा है। अमेरिका, यूरोप और जापान के केंद्रीय बैंकों ने ब्याज दरें बढ़ा दी हैं, जिसका असर अब भारत पर भी दिखेगा।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और बॉन्ड यील्ड भारत की चिंता बढ़ा रही हैं। अगर कच्चा तेल ऐसे ही महंगा बना रहा, तो भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) महंगाई पर लगाम लगाने के लिए रेपो रेट 0.75% से 1% तक बढ़ा सकता है।

इसका सीधा मतलब यह है कि आने वाले दिनों में आपके होम लोन और ऑटो लोन की EMI महंगी हो सकती है, वहीं कंपनियों के लिए भी नया कर्ज लेना खर्चीला साबित होगा। आइए ब्रोकरेज फर्म मोतीलाल ओसवाल (MOFSL) की रिपोर्ट से समझते हैं वैश्विक स्तर पर क्या बदल रहा है और भारतीय अर्थव्यवस्था व आपकी जेब पर इसका क्या असर पड़ेगा।


सस्ते कर्ज का जमाना खत्म

मोतीलाल ओसवाल की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं अब ढीली मौद्रिक नीति का रास्ता छोड़ रही हैं और वित्तीय स्थितियां कड़ी की जा रही हैं। अमेरिका, यूरोप और जापान इन तीनों प्रमुख केंद्रीय बैंकों ने सितंबर में अपनी ब्याज दरों में बढ़ोतरी की है। ब्रिटेन ने दरों को फिलहाल स्थिर रखा है, लेकिन महंगाई को लेकर बेहद सतर्क रुख अपनाया है।

दुनिया के बड़े देशों में सिर्फ चीन एक अपवाद है जो अपनी सुस्त पड़ती अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए अब भी सस्ती ब्याज दरों की नीति पर चल रहा है। इन फैसलों के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कर्ज लेना और बॉन्ड के जरिए पैसा जुटाना पहले से काफी महंगा हो गया है।

भारत के सामने ये है 2 सबसे बड़ी चुनौतियां

दुनिया भर में बढ़ती ब्याज दरों और बॉन्ड यील्ड का सीधा दबाव भारतीय बाजार पर दिख रहा है।

बॉन्ड यील्ड में तेजी: भारत के 10-साल के सरकारी बॉन्ड पर यील्ड बढ़कर 7% के आसपास पहुंच गई है। मोतीलाल ओसवाल का अनुमान है कि FY27 के बाकी हिस्से में 10-वर्षीय बॉन्ड यील्ड 7.0% से 7.2% के दायरे में ही टिके रहने की संभावना है।

कच्चे तेल से बढ़ता महंगाई का खतरा: अगस्त में भले ही देश में रिटेल महंगाई दर काबू में दिखी हो, लेकिन खाद्य महंगाई अभी भी 6% के करीब है। ऐसे में अगर कच्चा तेल महंगा होता है, तो लॉजिस्टिक्स, ट्रांसपोर्टेशन और मैन्युफैक्चरिंग की लागत बढ़ जाएगी।

RBI के अनुमान से ज्यादा रहेगी महंगाई: MOFSL का मानना है कि इन दबावों के कारण FY27 की तीसरी तिमाही (Q3) में खुदरा महंगाई 6% के पार जा सकती है। फर्म ने FY27 के लिए भारत की औसतन महंगाई दर 5.1% रहने का अनुमान जताया है, जो कि रिजर्व बैंक के 5% के अनुमान से थोड़ा अधिक है।

क्या फिर बढ़ेगा रेपो रेट?

रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि औपचारिक रूप से रेपो रेट बढ़ाए जाने से पहले ही भारत में बॉन्ड यील्ड में तेजी, आरबीआई द्वारा लिक्विडिटी कम करने के उपायों और महंगे वैश्विक कर्ज के जरिए वित्तीय माहौल पहले ही सख्त हो चुका है।

इसके बावजूद अगर कच्चे तेल का झटका लंबा खींचता है और महंगाई की उम्मीदें बढ़ती हैं, तो आरबीआई के पास ब्याज दरें बढ़ाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा। ऐसी स्थिति में मौजूदा चक्र में कुल मिलाकर 75 से 100 बेसिस पॉइंट्स (0.75% से 1.00%) तक की दर बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।

किसकी चांदी, किसकी बढ़ेगी टेंशन?

कर्ज महंगा होने और ब्याज दरें बढ़ने का असर अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र पर एक समान नहीं होगा:

बैंकिंग सेक्टर: बैंकों को इस स्थिति में राहत मिल सकती है। उनके ज्यादातर लोन फ्लोटिंग-रेट पर होते हैं जिन्हें तुरंत रि-प्राइस किया जा सकता है, जिससे उनकी आय बढ़ेगी। साथ ही मजबूत डिपॉजिट बेस होने से उन्हें फंड जुटाने की बढ़ती लागत से निपटने में मदद मिलेगी।

NBFCs: नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों पर दबाव सबसे ज्यादा रहेगा क्योंकि वे होलसेल फंडिंग और रीफाइनेंसिंग पर काफी निर्भर होती हैं।

रियल्टी, ऑटो और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स: महंगे कर्ज की वजह से होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन की ईएमआई बढ़ जाएगी। नतीजतन, रियल एस्टेट, गाड़ियों और महंगे होम एप्लायंसेज की मांग पर ब्रेक लग सकता है। भारी कर्ज में फंसी कंपनियों की मुश्किलें भी बढ़ेंगी।

आईटी और फार्मा सेक्टर: डॉलर के मुकाबले रुपये में आने वाली गिरावट से आईटी और फार्मा जैसी एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड कंपनियों को कुछ हद तक सहारा मिल सकता है। हालांकि, अगर ग्लोबल लेवल पर कंपनियों ने टेक्नोलॉजी पर खर्च कम किया, तो आईटी सेक्टर पर दबाव बना रहेगा।

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