Hal Shashthi 2026 Date: हल षष्ठी का व्रत भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को रखा जाता है। यह व्रत माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि के लिए रखती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम जी का जन्म हुआ था। बलराम जी का मुख्य शस्त्र 'हल' है, इसलिए इस पर्व को हल षष्ठी, हलछठ, ललही छठ या तिनछठी भी कहा जाता है।
इस दिन हल से जोतकर उगाए गए किसी भी अनाज (जैसे गेहूं, चावल आदि) का सेवन नहीं किया जाता है। इस दिन व्रत करने वाली माताएं केवल बिना जुताई के पैदा होने वाले अनाज या फल खाती हैं, जैसे— तिन्नी/पसही का चावल, नारी का साग, मखाना, सिंघाड़ा, महुआ आदि। इस पूजा और व्रत में गाय के दूध, दही या घी का इस्तेमाल वर्जित होता है। केवल भैंस के दूध, दही और घी का उपयोग किया जाता है। महिलाएं इस दिन हल से जुते हुए खेतों में पैर नहीं रखती हैं।
हल छठ 2026 तारीख हल षष्ठी
वैदिक पंचांग के अनुसार, भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि 2 सितंबर को सुबह 6 बजकर 12 मिनट पर प्रारंभ होगी और 3 सितंबर को प्रात: 4 बजकर 25 मिनट पर खत्म होगी। उदयातिथि के अनुसार, हल छठ या हल षष्ठी 2 सितंबर बुधवार को है।
हल छठ पर बन रहे 3 शुभ योग
हल छठ का ब्रह्म मुहूर्त 04:29 ए एम से 05:14 ए एम तक है, लेकिन उस दिन कोई अभिजीत मुहूर्त नहीं है1 हल छठ की पूजा प्रदोष काल में यानि सूर्यास्त के बाद की जाती है, लेकिन स्थान विशेष के आधार पर अलग-अलग मान्यताएं और परंपराएं हो सकती हैं, उसका पालन करें। हल छठ पर सूर्यास्त 06:42 पी एम पर होगा। उसके तुरंत बाद प्रदोष काल प्रारंभ हो जाएगा।
लाभ-उन्नति मुहूर्त : 05:59 ए एम से 07:35 ए एम
अमृत-सर्वोत्तम मुहूर्त : 07:35 ए एम से 09:10 ए एम
शुभ-उत्तम मुहूर्त : 10:45 ए एम से 12:21 पी एम
चर-सामान्य मुहूर्त : 03:31 पी एम से 05:06 पी एम
लाभ-उन्नति मुहूर्त : 05:06 पी एम से 06:42 पी एम
हल छठ पर भद्रा और राहुकाल
हल छठ के दिन राहुकाल दोपहर में 12:21 पी एम से 01:56 पी एम तक रहेगा, वहीं भद्रा 3 सितंबर को 04:25 ए एम से लेकर 06:00 ए एम तक रहेगी। इसका वास स्वर्ग में होगा। इसलिए पूजा-पाठ में इसका कोई प्रभाव नहीं होगा।
घर के आंगन या पूजा स्थल को साफ करके वहां गोबर से छोटा सा तालाब (गड्ढा) बनाया जाता है।
इस तालाब में कुश, पलाश (ढाक) और झरबेरी की टहनियां गाड़ी जाती हैं।
हल षष्ठी माता और बलराम जी का ध्यान करके रोली, अक्षत, महुआ, चना, और 6 या 7 प्रकार के भुने हुए अनाज (सतनाजा) अर्पित किए जाते हैं।
हल षष्ठी व्रत की कथा सुनी जाती है। पूजा समाप्त होने के बाद शाम को चंद्र दर्शन कर अर्घ्य देकर व्रत का पारण किया जाता है।