BBA स्टूडेंट ने 3 महीने तक रोज 8.5 घंटे Rapido चलाया, एक दिन में 1200 रुपये तक कमाए फिर अपना एक्सपीरियंस डिटेल में बताया
BBA student: मंगलुरु के एक BBA सेकंड ईयर के स्टूडेंट ने कुछ अलग करने का फैसला किया। पहले सास की परीक्षाएं खत्म होने के बाद मिले लगभग 3 महीने के वेकेशन में उसने सड़कों पर उतर रैपिडो बाइक चलाने का फैसला किया। इसके बाद इस छात्र ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म रेडिट पर अपनी इस 3 महीने की यात्रा की पूरी कहानी बताई
BBA student: छात्र ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म रेडिट पर अपनी इस 3 महीने की यात्रा की पूरी कहानी बताई
आज के दौर में जब ज्यादातर कॉलेज स्टूडेंट्स छुट्टियों में घूमने-फिरने या आराम करने की सोचते हैं। वहीं, बेंगलुरु के एक BBA सेकंड ईयर के स्टूडेंट ने कुछ अलग करने का फैसला किया। पहले सास की परीक्षाएं खत्म होने के बाद मिले लगभग 3 महीने के वेकेशन में उसने सड़कों पर उतर रैपिडो बाइक चलाने का फैसला किया। इसके बाद इस छात्र ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म रेडिट पर अपनी इस 3 महीने की यात्रा की पूरी कहानी बताई। छात्र ने अपनी पोस्ट में रोज की कमाई, ऐप के एल्गोरिदम, रेस्टोरेंट के चक्करों और गिग वर्कर्स की जिंदगी की कठिनाई को विस्तार से बताया है।
सुबह 8 से शाम 4:30 बजे की ड्यूटी और ₹1200 की रोजाना कमाई
स्टूडेंट ने बताया कि वह सुबह लगभग 8 बजे ऐप पर ऑनलाइन होता था और शाम 4:30 बजे तक काम करके घर लौट आता था। यानी वह रोज करीब 8.5 घंटे सड़कों पर बिताता था। शुरुआत में उसे इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं था कि रैपिडो का प्लेटफॉर्म और एल्गोरिदम कैसे काम करता है। लेकिन धीरे-धीरे उसे समझ आने लगा कि शहर के किस इलाके में और किस समय राइड्स की डिमांड सबसे ज्यादा होती है। जैसे ही उसने एल्गोरिदम का को समझ लिया, उसकी कमाई आसान हो गई। एक दिन में वह रोजाना करीब ₹1200 तक कमा लेता था। छात्र के लिए पॉकेट मनी और साइड हसल के तौर पर यह कमाई काफी अच्छी थी।
पर क्या सबकुछ अच्छा ही था? गिग वर्कर्स की असली मजबूरी समझिए
इस तजुर्बे ने छात्र को उन लोगों की जिंदगी के बारे में गहराई से सोचने पर मजबूर कर दिया जो पूरी तरह से डिलीवरी या राइड-शेयरिंग पर ही निर्भर हैं। उसने बताया कि 8.5 घंटे के दौरान वह कभी ब्रेक नहीं लेता था या तो वह बाइक चला रहा होता था या फिर अगली राइड का इंतजार कर रहा होता था। छात्र का कहना है कि वह छुट्टियों में सिर्फ एक्सपीरियंस और पॉकेट मनी के लिए यह काम कर रहा था, इसलिए उसके पास किसी भी वक्त काम बंद करके घर जाने का विकल्प था। लेकिन जो लोग अपने परिवार को पालने के लिए फुल-टाइम यह काम करते हैं, उनके पास घर लौटने का ऐसा कोई विकल्प नहीं होता।
छात्र ने ऐप के सिस्टम पर भी नाराजगी जताई। उसने लिखा कि कैप्टन (ड्राइवर) का अपनी राइड्स पर कोई कंट्रोल नहीं होता। अगर कोई ग्राहक राइड कैंसिल कर देता है, तो उसकी गलती न होने के बावजूद ड्राइवर की रेटिंग खराब हो जाती है। किसी भी समस्या के समय ऐप से सही कस्टमर सपोर्ट पाना किसी बुरे सपने जैसा है।
दोपहर में जब राइड कम तो आजमाई ये ट्रिक
स्टूडेंट की पोस्ट के मुताबिक दोपहर 12 से 3 बजे के बीच राइड्स काफी कम हो जाती थीं, इसलिए वह इस दौरान फूड ऑर्डर डिलीवर करने लगा। उसने बताया कि रेस्टोरेंट का अनुभव एकदम अलग होता था। कभी खाना तुरंत मिल जाता तो कभी 20-25 मिनट तक खड़े होकर इंतजार करना पड़ता। अपने इस सफर की एक सबसे हैरान कर देने वाली घटना का जिक्र करते हुए उसने बताया कि रैपिडो के जरिए स्विगी का एक फूड ऑर्डर लिया था क्योंकि उसकी ड्रॉप लोकेशन लड़के के घर के पास थी।
वो एक आइसक्रीम शॉप से जुड़ा ऑर्डर था। पर जब वो आइसक्रीम शॉप पहुंचा तो वहां बिजली नहीं थी। उनकी मशीनें और कंप्यूटर बंद थे। वे ऑर्डर तैयार नहीं कर सकते थे। दुकान वालों ने उससे कहा कि उसे स्विगी को कॉल करके ऑर्डर कैंसिल कराना होगा।
उसने स्विगी को कॉल किया, तो उन्होंने कहा कि वे इसे कैंसिल नहीं कर सकते और उसे रैपिडो से संपर्क करना होगा। फिर उसने रैपिडो को कॉल किया, तो उन्होंने कहा कि यह स्विगी का ऑर्डर है इसलिए स्विगी से बात करो। कुल मिलाकर वो स्विगी और रैपिडो के इस इन्फिनिट लूप में फंस गया और 45 मिनट तक परेशान होता रहा। आखिरकार उसने देखा कि डिलीवरी लोकेशन एक ट्यूशन सेंटर की थी। उसने गूगल मैप्स पर ट्यूशन सेंटर का नंबर ढूंढा और उन्हें सीधे कॉल करके पूरी बात बताई। इसके बाद ट्यूशन सेंटर वालों ने रेस्टोरेंट स्टाफ से बात की और तब जाकर ऑर्डर कैंसिल हुआ।
छात्र ने बताया कि सबसे अजीब बात यह है कि रैपिडो तब तक कस्टमर का कांटेक्ट नंबर नहीं दिखाता जब तक आप खाना पिक न कर लें (जिसके लिए रेस्टोरेंट के ओटीपी की जरूरत होती है)। अगर वह ड्रॉप लोकेशन कोई रैंडम घर होता तो वह शायद कुछ नहीं कर पाता।
ऑटो ड्राइवरों लड़ाई हो जाने का भी खतरा
बेंगलुरु में अक्सर बाइक टैक्सी और ऑटो ड्राइवरों के बीच विवाद की खबरें आती रहती हैं। छात्र ने बताया कि 3 महीनों के दौरान वह मजेस्टिक, रेलवे स्टेशनों और दूसरे बिजी इलाकों में नियमित रूप से ऐप लॉगिन करता था। ऑटो वाले कई बार उसे घूर-घूरकर ऐसे देखते थे मानो उसे स्कैन कर रहे हों, लेकिन राहत की बात यह रही कि पूरे 3 महीनों में किसी भी ऑटो वाले ने उसे कभी धमकी नहीं दी और न ही कोई विवाद हुआ।
ग्राहकों के साथ उसका अनुभव काफी अच्छा रहा। उसने रास्ते में कई अनजान यात्रियों के साथ दिलचस्प बातचीत की और किसी भी ग्राहक के साथ उसका कोई कड़वा अनुभव नहीं रहा। उसने यह काम आरटीओ और बैन वाले हालिया विवादों से पहले ही खत्म कर लिया था, इसलिए उसे उस तरह की किसी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा।
3 महीने के सफर से मिला जिंदगी का सबसे बड़ा सबक
इस BBA छात्र का मानना है कि यह 3 महीने का सफर सिर्फ ₹1200 रोज कमाने के बारे में नहीं था। इसने उसे जमीनी हकीकत दिखाई। राइड के लिए लंबा इंतजार, पेट्रोल का खर्च, अनिश्चितता, प्लेटफॉर्म के कड़े नियम, रेस्टोरेंट की परेशानियां और लगातार चलते रहने का मानसिक दबाव जैसी जमीनी हकीकतों से उसे रुबरू होना पड़ा।
रेडिट पोस्ट के आखिर में उसने अपने इस अनुभव का सबसे बड़ा हासिल बताते हुए लिखा है कि 'एक स्टूडेंट के तौर पर 3 महीने के लिए गिग वर्क करना और अपने परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए इसे मजबूरी में करना, दोनों स्थितियों में जमीन-आसमान का फर्क है। मेरे लिए यह महज एक साइड हसल था, लेकिन किसी और के लिए वही ₹1,200 उसके घर के बिल भरने और भूखे रहने के बीच का इकलौता सहारा हो सकते हैं।'