केरल के मुन्नार की पहाड़ियों पर इन दिनों प्रकृति का बेहद दुर्लभ नजारा देखने को मिल रहा है। करीब 12 साल के इंतजार के बाद नीलकुरिंजी के फूल एक बार फिर खिल उठे हैं। मैट्टुपेट्टी के पास कोरंडाकाडु और चोक्करामुडी इलाकों में दूर तक फैले बैंगनी-नीले फूल पहाड़ों को किसी खूबसूरत पेंटिंग जैसा बना रहे हैं। यह नजारा सिर्फ पर्यटकों ही नहीं, बल्कि प्रकृति प्रेमियों के लिए भी खास आकर्षण बन गया है।
अगस्त से शुरू हुआ फूलों का सिलसिला
नीलकुरिंजी के फूलों का खिलना अगस्त में शुरू हुआ। ANI की रिपोर्ट के मुताबिक, चोक्करामुडी क्षेत्र को 24 अगस्त से पर्यटकों के लिए खोल दिया गया। वन अधिकारियों का अनुमान है कि सितंबर के दौरान यह प्राकृतिक नजारा ऊंचाई वाले दूसरे इलाकों तक भी फैल सकता है।
आने वाले दिनों में मीसापुलिमाला के कुछ हिस्सों में भी फूलों के खिलने की उम्मीद है। यानी प्रकृति प्रेमियों के पास इस दुर्लभ नजारे को करीब से देखने का मौका है।
आखिर 12 साल में एक बार ही क्यों खिलता है ये फूल?
नीलकुरिंजी का वैज्ञानिक नाम Strobilanthes kunthiana है। इसकी सबसे खास बात इसका असामान्य फूलने का चक्र है। पश्चिमी घाट के कई इलाकों में यह पौधा लगभग 12 साल में एक बार फूल देता है। जब इसका समय आता है तो हजारों पौधे लगभग एक साथ खिल उठते हैं। इसी वजह से पहाड़ों पर दूर तक बैंगनी और नीले रंग की चादर जैसी दिखाई देती है।
फूल खिलने के बाद खत्म हो जाता है पौधा
नीलकुरिंजी का जीवनचक्र भी बेहद दिलचस्प है। फूल आने के बाद पौधा बीज पैदा करता है और फिर धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है। इसके बीजों से अगली पीढ़ी तैयार होती है, जो कई वर्षों तक बढ़ती रहती है। एक ही समय में बड़ी संख्या में पौधों का फूलना gregarious flowering कहलाता है। यही प्राकृतिक प्रक्रिया नीलकुरिंजी को इतना दुर्लभ और आकर्षक बनाती है।
2026 में ही क्यों खिला नीलकुरिंजी?
कई लोगों को लग सकता है कि नीलकुरिंजी का 2026 में खिलना समय से पहले है, लेकिन ऐसा नहीं है। मुन्नार के अलग-अलग क्षेत्रों में नीलकुरिंजी की आबादी का फूलने का समय अलग होता है। चोक्करामुडी और मैट्टुपेट्टी की आबादी इससे पहले 2014 में खिली थी। इसलिए 2026 में इसका दोबारा खिलना उसके प्राकृतिक चक्र के मुताबिक ही है।
2030 वाला नीलकुरिंजी इससे अलग है
मुन्नार के नीलकुरिंजी को लेकर 2030 में होने वाले बड़े फूलों की भी चर्चा होती है। इसकी वजह यह है कि एराविकुलम नेशनल पार्क में मौजूद अलग आबादी ने 2018 में फूल दिए थे और उसके अगले बड़े फूल करीब 2030 में आने की उम्मीद है। यानी 2026 और 2030 के फूल एक ही आबादी के नहीं हैं। दोनों अलग-अलग प्राकृतिक चक्रों से जुड़े हैं।
खूबसूरती के पीछे छिपी संरक्षण की चिंता
नीलकुरिंजी जितना खूबसूरत है, उसका प्राकृतिक आवास उतना ही संवेदनशील भी है। ऊंचाई वाले शोल-घासभूमि क्षेत्र में प्लांटेशन का विस्तार, शहरीकरण, बाहरी प्रजातियों का फैलाव और बढ़ता पर्यटन इसके लिए चुनौती बन रहे हैं। 2024 में Strobilanthes kunthiana को IUCN Red List में Vulnerable यानी असुरक्षित श्रेणी में आंका गया था। इसलिए मुन्नार की बैंगनी पहाड़ियों का यह नजारा सिर्फ देखने लायक खूबसूरती नहीं, बल्कि प्रकृति को बचाने की याद दिलाने वाला दुर्लभ अवसर भी है।