'इसमें महिलाओं के प्रति नफरत साफ दिखती है', साइकोलॉजिस्ट ने करवा चौथ और पतियों को लेकर कही ये बात

मनोवैज्ञानिक दिविजा भसीन ने यह सवाल उठाया है कि आखिर पतियों की सेहत और लंबी उम्र के लिए सिर्फ पत्नियों से ही व्रत रखने की उम्मीद क्यों की जाती है; इस बात ने जेंडर भूमिकाओं (gender roles) को लेकर एक बहस छेड़ दी है।

अपडेटेड Oct 29, 2026 पर 1:46 PM
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इंस्टाग्राम पर एक वीडियो में काउंसलिंग साइकोलॉजिस्ट दिविजा भसीन ने इस प्रथा की आलोचना की। उन्होंने कहा कि पतियों को ऐसी रीतियों पर सवाल उठाना चाहिए, जिनमें उनकी पत्नियों को उनकी भलाई के लिए भूखा-प्यासा रहना पड़ता है।

करवा चौथ एक ऐसा त्योहार है, जिसमें विवाहित हिंदू महिलाएं अपने पतियों की अच्छी सेहत और लंबी उम्र के लिए व्रत रखती हैं। अब एक महिला ने यह सवाल उठाकर जेंडर भूमिकाओं (gender roles) पर बहस छेड़ दी है कि आखिर सिर्फ पत्नियों से ही बिना खाए-पिए रहने की उम्मीद क्यों की जाती है। उनका तर्क है कि शादी में प्यार और परवाह दोनों तरफ से होनी चाहिए। उन्होंने पूछा कि पति अपनी पत्नियों के लिए ऐसा ही व्रत क्यों नहीं रखते? इस साल यह त्योहार 29 अक्टूबर को मनाया जा रहा है, जिसमें महिलाएं शाम को चांद देखने के बाद अपना व्रत खोलती हैं।

पतियों को अपनी पत्नियों को तकलीफ सहते हुए नहीं देखना चाहिए

इंस्टाग्राम पर एक वीडियो में काउंसलिंग साइकोलॉजिस्ट दिविजा भसीन ने इस प्रथा की आलोचना की। उन्होंने कहा कि पतियों को ऐसी रीतियों पर सवाल उठाना चाहिए, जिनमें उनकी पत्नियों को उनकी भलाई के लिए भूखा-प्यासा रहना पड़ता है। उन्होंने कहा- "अपनी प्यारी पत्नी को अपने लिए भूखा-प्यासा और तड़पता हुआ देखकर भी चुप रहना, बेशर्मी की पराकाष्ठा है। इसका मतलब यह है कि या तो आपके मन में उनके लिए कोई संवेदना नहीं है या फिर आपको 'पुरुषों की पूजा' (पुरुषों को देवता मानने की प्रथा) से खुशी मिलती है।"


भसीन ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि यह त्योहार समाज में शादी के अंदर महिलाओं की जगह के बारे में क्या संदेश देता है। उन्होंने तर्क दिया कि महिलाओं को अपना प्यार साबित करने के लिए तकलीफ सहनी पड़ती है, जबकि पुरुषों से ऐसी कोई उम्मीद नहीं की जाती।

"करवा चौथ जैसा त्योहार हमें दिखाता है कि समाज में पुरुष महिलाओं को किस नजरिए से देखते हैं। इसका सीधा सा मैसेज यह है कि महिलाओं को अपने पति के लिए तकलीफ सहकर अपना प्यार साबित करना पड़ता है, जबकि पतियों को उनके लिए ऐसा कुछ नहीं करना पड़ता। इसमें महिलाओं के प्रति नफरत साफ झलकती है। आखिर पुरुष भी व्रत क्यों नहीं रख सकते?"

उन्होंने व्रत के आखिर में पत्नियों द्वारा अपने पतियों की पूजा करने और उनके पैर छूने की रस्म की ओर भी इशारा किया। उन्होंने अंत में कहा- "सबसे अजीब बात तो यह है कि आखिर में महिला को अपने पति की पूजा करनी पड़ती है और उसके पैर छूने पड़ते हैं। वह सचमुच उसके लिए भूखी रह रही है! असल में तो पति को उस ज़मीन की पूजा करनी चाहिए जिस पर वह महिला चलती है। सच कहूँ तो, अपनी पत्नी को अपने लिए तकलीफ सहने देने पर आपको शर्म आनी चाहिए। आप एक लूजर हैं।

कैप्शन में भसीन ने खुद को एक काउंसलिंग साइकोलॉजिस्ट के तौर पर पेश किया, जो मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक मुद्दों पर कंटेंट बनाती हैं—ऐसे मुद्दे जिन पर अक्सर खुलकर बात नहीं की जाती।

इस त्योहार को लेकर सोशल मीडिया यूजर्स की मिली-जुली राय सामने आई

इस वीडियो को देखकर यूजर्स ने इस परंपरा पर अपनी राय रखी और चर्चा की कि क्या इसे इसी रूप में जारी रहना चाहिए। एक यूजर ने लिखा- "मुझे समझ नहीं आता कि महिलाएं इसका समर्थन कैसे करती हैं।" एक अन्य यूजर ने व्रत के बारे में अपनी निजी राय देते हुए कहा- "मुझे तो आम व्रत भी पसंद नहीं हैं। मेरा मानना ​​है कि भगवान मुझे अच्छे से खाया-पिया और खुश देखना पसंद करते हैं।"

कुछ यूजर्स ने कहा कि वे इस प्रथा से बाहर निकलना चाहते हैं। एक व्यक्ति ने कमेंट किया- "मैं अपने परिवार में इस परंपरा को तोड़ने वाला पहला व्यक्ति बनूंगा।" जबकि एक और यूजर ने लिखा- "इसके पीछे का संदेश यह है... तुम मेरे लिए भूखी रहो और मैं तुम्हारे लिए भूखा रहूंगा... शादी दोनों तरफ से होती है।"

कुछ अन्य लोगों ने ज्यादा बराबरी वाले नजरिए की वकालत की। एक कमेंट में लिखा था- "इसे उत्पीड़न तो नहीं कह सकते, लेकिन शायद पुरुषों को भी व्रत रखना चाहिए।" एक और यूजर ने सवाल उठाया कि यह परंपरा अभी भी क्यों चल रही है। उन्होंने लिखा- "अब समय आ गया है कि हम इन सब चीजों को खत्म कर दें! यह पागलपन है 2026 चल रहा है!"

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