फिल्म- बंदर
फिल्म- बंदर
कलाकार- बॉबी देओल, सपना पब्बी, सान्या मल्होत्रा, सबा आजाद, इंद्रजीत सुकुमारन, जीतेंद्र जोशी, राज बी शेट्टी, आमिर अजीज, सुकांत गोयल, अंकुश गेदाम, अरबिंदो भट्टाचार्जी, शेन ग्रेगोइरे
निर्देशक- अनुराग कश्यप
रोटिंग-3
Bandar Review: पिछले कुछ सालों में अनुराग कश्यप ने एक ऐसे फिल्म निर्माता का बेचैन स्वभाव बना लिया है, जो किसी शैली को उसके ऑरिजनल रूप में रहने नहीं दे रहा है। वे उसे उठाते हैं, उसकी सतह को खुरचते हैं, उसकी जड़ों को मरोड़ते हैं, उसमें क्रिएटविटी भर देते हैं। कुछ ऐसा ही उन्होंने अपनी फिल्म बंदर के साथ किया है। इसमें बॉबी देओल, सपना पब्बी, सान्या मल्होत्रा, सबा आज़ाद और कई शानदार कलाकार हैं। यह फिल्म मीटू मूवमेंट को परेशान कर देने रूप में पेश करती है, जिसमें रेप के आरोप के सामाजिक, कानूनी और मेंटली रिजल्ट को दिखाया गया है। दोषी और निर्दोष के नजरिए से। यह एक मिक्स एक्सपीरिएंस है। कहीं बनावटी लगता है, तो कहीं चौंका देता है।
फिल्म की समर मेहरा (बॉबी देओल) से शुरू होती है। समर एक टीवी स्टार है, जो कभी फेमस हुआ करता था, लेकिन अब उसी इंडस्ट्री ने उसे साइड लाइन कर दिया है। अब वो वो शख्स नहीं रहा, जिसका नाम सुनते ही हर जगह लोग क्रेजी हो जाते थे। समर छोटे-मोटे काम करता है और धीरे-धीरे मिटती अपनी शोहरत को फिर से पाने की कोशिश करता है। उस पर EMI का बोझ है, हाउसहेल्प को पैसे नहीं दे पा रहा है। उसके चेहरे पर निराशा साफ दिखाई देती है। लेकिन समर की जिंदगी में सब कुछ खराब नहीं है। वो खुशी यानी सबा आजाद के साथ डेटिंग कर रहा है, और उम्र का अंतर साफ नजर आता है, फिर भी लगता है कि वो काफी समय से साथ है। लेकिन एक शाम समर की जिंदगी तब पूरी तरह से लगती है जब कुछ पुलिसकर्मी उसके घर आते हैं और उसे पुलिस स्टेशन ले जाते हैं। इसके बाद से शुरू होती है कहानी, जिसे देखने के लिए आपको सिनेमाघर जाना होगा।
बंदर में जेल का हिस्सा सबसे दिलचस्प सीन में से एक है। खचाखच भरी जेल, वॉशरूम ओवरफ्लो हो रहे हैं, कॉकरोच कैदियों की तरह इधर-उधर घूमते हैं, खाना कीड़ों से भरा है, और हवा भी बासी सी लगती है। यहां सनकी और अजीब किरदार हैं, और स्वाभाविक रूप से, गुट भी हैं। एक ग्रुप में रेप के आरोपी पुरुष हैं, जबकि बड़ा और अधिक प्रभावशाली गुट लिजो के नेतृत्व में है, जिसका किरदार इंद्रजीत सुकुमारन ने निभाया है। उसका समूह कैदियों का एक अजीब मिक्स है, जिसमें ड्रग तस्करों से लेकर हत्या के आरोपी तक शामिल हैं। समर इन दो दुनियाओं के बीच भटकता रहता है, चुपचाप अपनी स्थिति की बेतुकीपन से जूझता रहता है, और ईंट-ईंट करके बिखरती अपनी जिंदगी के बावजूद आशा बनाए रखने की कोशिश करता है।
इस पूरे घटनाक्रम के सेंटर में गायत्री आनंद हैं, जिनका किरदार सपना पब्बी ने निभाया है। गायत्री की मुलाकात समर से एक डेटिंग ऐप पर हुई थी। गायत्री को समर से बेहद प्यार हो जाता है, लेकिन समर के मन में वैसी भावनाएं नहीं दिखतीं। गायत्री उससे बेहद लगाव रखती है, मानो जुनून की हद तक उसके प्रति अटरेक्ट हो, क्योंकि वह बार-बार बिना बताए उसके फ्लैट पर जाती है। कभी वह उसके लिए खाना बनाकर लाती है, तो कभी उसके घर की साज-सज्जा ठीक करवाने की कोशिश करती है, क्योंकि उसे लगता है कि वहां निगेटिव एनर्जी है।
अनुराग कश्यप की अधिकांश फिल्मों की तरह, बंदर की शुरुआत भी बेहतरीन ढंग से होती है। शुरुआत से ही एक्साइटमेंट जागने लगती है। समर के सिंपल से फ्लैट, घर के नौकर से उसकी बातचीत और सालों से ढलती शोहरत और अवसरों की कमी के बाद उसके चेहरे पर जमी खामोश उदासी से झलकती है। उसके चेहरे पर तनाव साफ दिखाई देता है। कई जगह कॉमेडी से भरे सीन भी आते हैं।
कुछ ऐसे सीन भी हैं जो इतने वास्तविक लगते हैं कि उन्हें महज लेखन कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। बंदर फिल्म की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें विचाराधीन कैदियों की जेल को बेहद हूबहू तरीके से दिखाया गया है। फिल्म उन लोगों की दुर्दशा को दर्शाती है, जो अनिश्चितता में फंसे हुए हैं, कभी सालों तक तो कभी अनंत काल तक। फिल्म से कोर्टरूम ड्रामा की उम्मीद की जा सकती है, लेकिन कश्यप झूठे आरोप में फंसने की कीमत और परिणामों में अधिक रुचि रखते हैं, और उस घटनाक्रम में जो तब सामने आता है जब कुछ ही दिनों में किसी व्यक्ति का जीवन बिखरने लगता है।
तकनीकी रूप से भी, बंदर ने एक घुटन भरे जेल परिसर का बेहतरीन रूप पेश किया है, जो हर तरह के लोगों से भरा हुआ है और दर्शकों को समर से मिलने वाले हर किरदार की नैतिकता को समझने के लिए प्रेरित करता है। एक है लीजो, जिसकी हर मदद की कोई न कोई कीमत होती है, और फिर एक पूर्व सुरक्षा गार्ड है जो दावा करता है कि उस पर रेप का झूठा आरोप लगाया गया था, लेकिन अगले ही पल वह बेपरवाही से कहता है कि अगर महिलाएं छोटे कपड़े पहनेंगी तो उनके साथ रेप होना तय है। समर खुद भी नैतिक दुविधाओं से मुक्त नहीं है। कुछ सीन में धमाकेदार ज़ूम का इस्तेमाल किया गया है और बैकग्राउंड स्कोर माहौल को और भी प्रभावशाली बना देता है। अमित त्रिवेदी का म्यूजिक अच्छा है। "पिंजरा" जैसा गाना इसलिए कारगर है।
अभिनय की बात करें तो, बॉबी देओल ने अच्छा काम किया है। हालांकि, रोने वाले सीन्स में उनका प्रदर्शन थोड़ा कमजोर लगता है। गायत्री के किरदार में सपना पब्बी ने बढ़िया एक्टिंग की है। खुशी के किरदार में सबा आज़ाद, सुहानी मेहरा के किरदार में सान्या मल्होत्रा ने किरदार में जान डाल दी है। इंद्रजीत सुकुमारन, जितेंद्र जोशी राज बी शेट्टी, आमिर अजीज, सुकांत गोयल, अंकुश गेदम और अरबिंदो भट्टाचार्य ने बखूबी कैरेक्टर को पकड़ा है।
बंदर परफेक्ट तो नहीं है। यह फिल्म हर किसी के टेस्ट पर खरी नहीं उतरेगी। मुख्य रूप से इसलिए क्योंकि यह क्रिएटिव सिनेमा लवर्स के साथ-साथ एक कमर्शियल दर्शक वर्ग को भी लुभाने की कोशिश करती है। दोनों को संतुष्ट करने के प्रयास में, फिल्म थोड़ी कमजोर है। हां लेकिन इसे एक बार देखा जा सकता है।
हिंदी में शेयर बाजार, स्टॉक मार्केट न्यूज़, बिजनेस न्यूज़, पर्सनल फाइनेंस और अन्य देश से जुड़ी खबरें सबसे पहले मनीकंट्रोल हिंदी पर पढ़ें. डेली मार्केट अपडेट के लिए Moneycontrol App डाउनलोड करें।