Asit Kumar Modi: जेठालाल- दयाबेन के किरदार को लेकर बोले असित मोदी, कभी नहीं सोचा था कि दोनों को इतना प्यार मिलेगा

Asit Kumar Modi: 16 सालों से ज्यादा समय से लोगों का दिल जीत रहा, तारक मेहता का उल्टा चश्मा के पॉपुलर किरदारों खासकर जेठालाल, दायबेन और गोकुलधाम सोसाइटी ने लोगों का दिल जीता है। असित मोदी दोनों किरदारों को लेकर बड़ी बात कही है।

अपडेटेड Jan 02, 2026 पर 4:19 PM
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जेठालाल- दयाबेन के किरदार को लेकर बोले असित मोदी

Asit Kumar Modi: जब 2008 में तारक मेहता का उल्टा चश्मा का प्रीमियर हुआ, तो भारतीय टेलीविजन पर मुख्य रूप से हाई-वोल्टेज सास बहू नाटकों का बोलबाला था। कॉमेडी पहले से मौजूद थी, लेकिन ज़्यादातर वीकेंड में या फिर हल्के-फुल्के शोज के रूप में। इस शो ने चुपचाप उस दायरे को तोड़ते हुए एक डेली सिटकॉम की शुरुआत की।

सोलह साल बाद भी, तारक मेहता का उल्टा चश्मा टेलीविजन पर सबसे लंबे समय तक चलने वाला नॉन-फिक्शन कॉमेडी शो बना हुआ है और इसे हर उम्र और देश के लोग देखते हैं। इसके किरदार जैसे कि दिलीप जोशी द्वारा निभाया गया जेठालाल गाड़ा, दिशा वकानी द्वारा निभाई गई दायबेन, मंदार चंदवाडकर द्वारा निभाया गया आत्माराम तुकाराम भिडे, पोपटलाल, सोढ़ी और अय्यर इस शो की रीढ़ हैं। अपनी शुरुआत से ही, इसके किरदारों ने दर्शकों के दिलों में अपनी जगह बना ली है।

दिलीप जोशी द्वारा अभिनीत शो का किरदार जेठालाल, भारतीय टेलीविजन पर सबसे अधिक पहचाने जाने वाले किरदारों में से एक बन गया है। हाल में दिए इंटरव्यू में शो के निर्माता असित कुमार मोदी ने कहा कि शुरुआत से ही शो का मूल उद्देश्य दर्शकों से जुड़ाव बनाए रखना था। उन्होंने अपने हिट सिटकॉम की नींव रखने के लिए रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जुड़ी चीज़ें लीं।


जब असित कुमार मोदी से पूछा कि क्या उन्होंने जेठालाल, दया बेन, भिडे और अन्य किरदारों की इतनी सफलता की कल्पना की थी, जो अब एक आइकॉन बन चुके हैं। इस पर उन्होंने कहा "मैंने कभी नहीं सोचा था कि ये किरदार इतनी सफलता हासिल करेंगे। इसके पीछे कोई योजना या सोची-समझी रणनीति नहीं थी। मैंने बस सादगीपूर्ण जीवन और सच्ची कहानी पर आधारित शो बनाने पर ध्यान केंद्रित किया।"

उन्होंने कहा कि “शुरू से ही मेरा विचार स्पष्ट था। मैं एक पारिवारिक शो बनाना चाहता था, जिसे लोग काम के लंबे दिन के बाद थके-हारे घर आकर एक साथ देख सकें। मेरा मकसद उन्हें आराम, मन की शांति और कुछ पल की सच्ची खुशी देना था। लगभग 2008 के आसपास, टेलीविजन पर ज्यादातर सीरियस शोज ही दिखाए जाते थे। उस समय कॉमेडी शो बहुत कम थे, और मुझे लगा कि साफ-सुथरी, मनोरंजक कॉमेडी की सख्त जरूरत है जिसका पूरा परिवार आनंद ले सके।

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