Satluj: दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'पंजाब '95' का नाम बदलकर अब 'सतलुज' कर दिया गया है और आखिरकार यह रिलीज हो गई है। यह फ़िल्म शुक्रवार को चुपचाप एक OTT प्लेटफ़ॉर्म पर रिलीज़ हुई। हनी त्रेहान के निर्देशन में बनी 'सतलुज' फिल्म सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (CBFC) के साथ दिक्कतों के कारण देर से रिलीज़ हुई। एक्टिविस्ट जसवंत सिंह खालरा की जिंदगी और मौत पर आधारित यह फ़िल्म पिछले साल फरवरी में दुनिया भर में रिलीज होने वाली थी। हालाँकि, इसकी रिलीज को अनिश्चित काल के लिए टाल दिया गया था। अब यह फ़िल्म Zee5 पर स्ट्रीम करने के लिए उपलब्ध है।
OTT प्लेटफ़ॉर्म के ऑफ़िशियल इंस्टाग्राम अकाउंट से किए गए नए पोस्ट के कैप्शन में यह लिखा है- कुछ कहानियां दबी नहीं रहती। ‘सतलुज’ देखें, जो अब सिर्फ़ Zee5 पर स्ट्रीम हो रही है। इस पोस्ट में दिलजीत के साथ-साथ उनके को-स्टार्स अर्जुन रामपाल और सुरिंदर विक्की के इंस्टाग्राम अकाउंट्स को भी टैग किया गया।
हनी त्रेहान की डायरेक्ट की हुई और रॉनी स्क्रूवाला की प्रोड्यूस की हुई फिल्म 'सतलुज' में वरुण बडोला और गीतिका विद्या ओहलन भी हैं। जब से इसे सर्टिफिकेशन के लिए CBFC के पास भेजा गया था, तब से यह फिल्म लगभग तीन साल से विवादों में घिरी हुई है।
यह दूसरी बार है जब फिल्म का टाइटल बदला गया है। 2022 में 'सतलुज' का नाम बदलकर 'पंजाब '95' कर दिया गया था। इससे पहले इसका नाम 'घलूघारा' (घलूघारा नरसंहार के नाम पर) था। फिल्म को सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ फ़िल्म सर्टिफ़िकेशन (CBFC) के पास भेजा गया था। हालांकि, CBFC ने फिल्म में 120 कट लगाए और टाइटल पर आपत्ति जताई। आखिरकार, सिखों की सबसे बड़ी धार्मिक संस्था, शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) ने दखल दिया और CBFC कट लगाने पर तो मान गई, लेकिन टाइटल बदलने की बात पर अड़ी रही। आखिरकार, फिल्म का नाम बदलकर 'पंजाब '95' कर दिया गया। उसी साल YouTube पर फिल्म का ट्रेलर लॉन्च किया गया था, लेकिन एक दिन बाद ही उसे हटा दिया गया।
इतना ही नहीं, इस फ़िल्म का वर्ल्ड प्रीमियर 2023 में मशहूर टोरंटो इंटरनेशनल फ़िल्म फ़ेस्टिवल (TIFF) में होना था, लेकिन प्रीमियर की तारीख से ठीक एक दिन पहले इसे लिस्ट से हटा दिया गया। 'वैरायटी' को एक सूत्र ने बताया कि टोरंटो से फ़िल्म को हटाए जाने के पीछे 'राजनीतिक ताकतों का हाथ' है, क्योंकि भारत के बाद कनाडा में ही सिखों की आबादी सबसे ज़्यादा है। फ़ेस्टिवल के आयोजकों ने कभी भी इस बात की पुष्टि या खंडन नहीं किया।
पंजाब के मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा ने उग्रवाद के दौर में पंजाब पुलिस द्वारा सिख युवाओं के कथित फ़र्ज़ी एनकाउंटर के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ी थी। उन्होंने 1984 और 1994 के बीच पंजाब में हज़ारों अज्ञात शवों के सामूहिक अंतिम संस्कार की जांच की थी।
1995 में वे रहस्यमय तरीके से गायब हो गए और एक दशक बाद, 2005 में, उनके अपहरण और हत्या के आरोप में चार पुलिस अधिकारियों को गिरफ़्तार किया गया। उनका जीवन और मौत राज्य के संवेदनशील इतिहास का एक विवादास्पद हिस्सा है, खासकर उग्रवाद से जुड़े मामलों के कारण। 2007 में, पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने उनकी शुरुआती सात साल की सजा को बढ़ाकर आजीवन कारावास में बदल दिया।