फिल्म-मैं वापस आऊंगा
फिल्म-मैं वापस आऊंगा
रेटिंग-4/5
कलाकार-दिलजीत दोसांझ, नसीरुद्दीन शाह, वेदांग रैना और शारवरी
निर्देशक-इम्तियाज़ अली
Main Vaapas Aaunga Review: 'मैं वापस आऊंगा' कहानी है कीनू की, जो सिख परिवार का एक कॉलेज स्टूडेंट है। वह जिया नाम की मुस्लिम लड़की के प्यार में पड़ जाता है। जब वे दोनों अपनी बढ़ती नज़दीकियों और नए-नए प्यार में खोए हुए होते है, तब भारत मुश्किल दौर से गुज़र रहा था। दोनों शादी करने की प्लानिंग करते हैं, तभी भारत और पाकिस्तान के बंटवारे का ऐलान हो जाता है। यह फ़िल्म अलग-अलग टाइमलाइन को दिखाती है और बताती है कि कैसे कीनू 78 साल बाद भी अपनी जिया से मिलने के लिए तड़प रही है और अपनी मौत से पहले उससे आखिरी बार मिलना चाहता है।
क्या निर्वैर यानी दिलजीत दोसांझ अपने दादाजी की आखिरी इच्छा पूरी करने में उनकी मदद कर पाएगा? इम्तियाज़ अली के निर्देशन में बनी इस फ़िल्म में शरवरी ने जिया का किरदार निभाया है, वेदांग रैना ने युवा कीनू का और नसीरुद्दीन शाह ने बुज़ुर्ग कीनू का रोल किया है।
फिल्म की कहानी
फिल्म की शुरुआत नसीरुद्दीन शाह के किरदार 'कीनू' से होती है, जो डिमेंशिया से जूझ रहे हैं और असलियत और अपने ख्यालों के बीच तालमेल बिठाने की कोशिश कर रहे हैं। 'मैं वापस आऊंगा' फिल्म दो अलग-अलग समय (टाइमलाइन) में चलती है। फिल्म के दूसरे हिस्से का मज़ा लेने के लिए आपको पहला हिस्सा ध्यान से देखना होगा। फिल्म का पहला हिस्सा किरदारों से परिचय कराने पर केंद्रित है। एक आदमी जो किसी मकसद को पूरा करने की कोशिश में है, जो सब कुछ ठीक करने के लिए बेताब है और पूरी कोशिश कर रहा है-बिल्कुल इम्तियाज़ अली के हीरो जैसा। लेकिन फ़र्क क्या है? इस बार कहानी ऐसी नहीं है जिससे हर कोई आसानी से जुड़ सके। यह एक ऐसी सच्चाई है जिसका सामना बहुत से लोगों ने भारत-पाकिस्तान बंटवारे के उस सबसे मुश्किल दौर में किया होगा। एक दादा की अपने पुराने शहर को फिर से देखने की ज़िद के तौर पर शुरू हुई कहानी जल्द ही एक पोते के सच का पता लगाने के मिशन में बदल जाती है।
निर्देशन
इम्तियाज़ अली के ज़्यादातर कामों की तरह, 'मैं वापस आऊंगा' इमोशनल अनुभव देती है। जिया के लिए कीनू की तड़प अक्सर रोमांस से ज़्यादा पूजा जैसी लगती है, जो 'लैला मजनू' जैसी फ़िल्मों में पहले दिख चुकी है। पीछे छूट गए लोगों के साथ क्या हुआ, अपनी लेव लेडी के पास वापस आने के लिए कीनू का लगातार स्ट्रगल और फ़िल्म का एंड आपकी आंखों में आंसू ला देगा। फ़िल्म का इमोशनल असर इतना ज़बरदस्त है कि आप इसके धीमे पहले हाफ़ को भी नज़रअंदाज़ कर देते हैं।
परफ़ॉर्मेंस
इसे वेदांग रैना और शरवरी की फ़िल्म के तौर पर प्रमोट किया गया है, लेकिन असल में दिलजीत दोसांझ और नसीरुद्दीन शाह ही इसके रियल किरदार हैं और पूरी फ़िल्म में मज़बूत पिलर की तरह बने रहते हैं। निर्वैर के किरदार में दिलजीत ने पूरी कहानी को एक साथ बांधे रखा है। ऐसा लगता है मानो वे नसीरुद्दीन शाह की आंखों के ज़रिए हमें कीनू की ज़िंदगी के दोनों दौर जीने का एक्सपूरिएंस कराते हैं। उनके डायलॉग असरदार हैं, और जब वे कीनू और जिया जैसा प्यार पाने की इच्छा के बारे में बात करते हैं, तो हम सभी जुड़ाव महसूस करते हैं।
वेदांग रैना फ़िल्मों का चुनाव समझदारी से कर रहे हैं। 'मैं वापस आऊंगा' इस दिशा में उनका एक और मज़बूत कदम है। उन्हें इम्तियाज़ अली के साथ यंग मेल लीड के तौर पर काम करने का मौका मिला और उन्होंने ज़्यादातर मौकों पर अच्छा काम किया है। कुछ पल ऐसे भी है, जहां थोड़े से वह कमजोर पड़े हैं। लेकिन एक अच्छी परफ़ॉर्मेंस में ये छोटी-मोटी कमियां उनकी इग्नोर की जा सकती हैं। जब वे रोए तो हम भी रोए, जब वे मुस्कुराए तो हम भी मुस्कुराए और जब वे हंसे तो हम भी हंसे। उनका फ्यूचर ब्राइट नजर आ रहा है। शरवरी ने जिया के किरदार में अपनापन और चुलबुलापन बखूबी जोड़ा है, जिससे उनके हर सीन से जुड़ाव महसूस हुआ है। हालांकि फ़िल्म में उनके सीन काफी कम हैं, फिर भी उन्होंने हर फ़्रेम में जान डाली है।
यह फ़िल्म इम्तियाज़ अली, ए.आर. रहमान और म्यूजिक इरशाद कामिल की मशहूर तिकड़ी को फिर से एक साथ लाती है, जिन्होंने पहले 'रॉकस्टार', 'हाईवे' और 'तमाशा' जैसी फ़िल्मों में साथ काम किया है। फ़िल्म के पहले दो गाने, 'इश्क़ मस्ताना' और 'मस्कारा', फ़िल्म के पहले हिस्से में आते हैं, जब आप कहानी से जुड़ने की कोशिश कर रहे होते हैं। हालांकि दोनों गाने दिल को छू लेने वाले हैं, लेकिन उनका पूरा फ़ायदा नहीं उठाया गया और उन्हें कहानी में और बेहतर ढंग से पिरोया जा सकता था। वहीं दूसरी ओर, 'वो नहीं' और 'क्या कमाल है' गाने रोंगटे खड़े कर देते हैं।
फ़िल्म की एक और ख़ूबसूरत बात यह है कि जब भी कीनू और जिया मिलते हैं, तो बैकग्राउंड में एक जानी-पहचानी धुन बजती है। अगर आप सोच रहे हैं कि वह कौन सी धुन है, तो वह है 'हम तेरे प्यार में सारा आलम', और यह फ़िल्म के मूल भाव और जो कुछ भी यह कहना चाहती है, उसे बखूबी बयां करती है।
'मैं वापस आऊंगा' में कुछ कमियां भी हैं और यह शायद हर किसी को अपनी कहानी न लगे। लेकिन फ़िल्म की ख़ूबसूरती इसमें है कि यह हमें उस एहसास से जोड़ती है जिससे बहुत से लोग गुज़रे थे। 'मैं वापस आऊंगा' बंटवारे को उन प्रेमियों की नज़र से दिखाती है जिन्हें राजनीति, धर्म या दूसरों की सोच से कोई फ़र्क नहीं पड़ता। फिल्म को एक बार देखना जरूर चाहिए।
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