Obsess Movie Review: बॉलीवुड में एक्सपेरिमेंटल सिनेमा हमेशा से एक खास दर्शक वर्ग को आकर्षित करता रहा है। इस हफ्ते रिलीज हो रही क्राइम थ्रिलर ‘ऑब्सेस’ भी ऐसी ही एक अलग कोशिश है। सिर्फ़ दो मेन कैरेक्टर पर बेस्ड यह फ़िल्म एक मामूली सड़क विवाद से शुरू होकर डर और हिंसा की खतरनाक दुनिया में पहुंच जाती है। आज के रिव्यू में जानते हैं कैसी बनी है यह फ़िल्म।
कलाकार- पीटर विल्सन, ईशा सिंह
फ़िल्म की शुरुआत उत्तर भारत के किसी शहर की अंधेरी रात से होती है। एक सुनसान घर में पीटर (पीटर विल्सन) किसी की बेरहमी से हत्या करता है। मानसिक रूप से अस्थिर पीटर खुद को गलत नहीं मानता, बल्कि दुनिया को अपने खिलाफ समझता है। हत्या के बाद वह अपने ट्रक में बैठता है, दवाइयां खाता है और शराब पीने लगता है।
इसी दौरान उसके बॉस का मैसेज आता है कि शराब पीकर गाड़ी चलाने की वजह से उसे नौकरी से निकाल दिया गया है। अपमानजनक मैसेज पढ़कर पीटर का गुस्सा और बढ़ जाता है। वह सीधे अपने बॉस के घर पहुंचता है और उसकी भी हत्या कर देता है। इसके बाद पीटर चर्च पहुंचकर कन्फेशन बॉक्स में एक महिला की हत्या का अपराध स्वीकार करता है। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि कुछ ही देर बाद वह फादर को भी मार डालता है। उसे अब किसी इंसान पर भरोसा नहीं रहा।
दूसरी तरफ सारा (ईशा सिंह) अपने पति से अलगाव के दौर से गुजर रही है। वह अपने बच्चे की कस्टडी किसी भी हालत में पति को नहीं देना चाहती। अपने बेटे सचिन को लेकर वह मां के घर के लिए निकलती है। रास्ते में सड़क निर्माण कार्य के कारण उसे कार रोकनी पड़ती है। पीछे खड़ा पीटर लगातार हॉर्न बजाता है। सारा गुस्से में उसके ट्रक तक जाती है और उसे बदतमीज़ कहकर डांटती है। नशे में डूबा पीटर सिर्फ उसे घूरता रहता है। यहीं से शुरू होता है एक खतरनाक खेल। एक तरफ है मानसिक रूप से बीमार और हिंसक पीटर, दूसरी तरफ अपने बेटे के लिए किसी भी हद तक जाने वाली सारा। दोनों की यह टक्कर धीरे-धीरे ऐसी थ्रिलिंग कहानी में बदल जाती है, जहां हर पल खतरे का एहसास बना रहता है।
निर्देशक पीटर विल्सन ने सिर्फ दो किरदारों के इर्द-गिर्द पूरी फ़िल्म खड़ी की है, जो अपने आप में चुनौतीपूर्ण काम है। वह पीटर के मानसिक असंतुलन को बेहद नैचुरल अंदाज़ में दिखाते हैं। पीटर को लगता है कि दुनिया ने उसके साथ हमेशा गलत किया है और अब हिंसा ही उसका जवाब है। वहीं सारा के किरदार में उनका अहंकार, गुस्सा और मां का डर-तीनों परतें साफ दिखाई देती हैं। निर्देशक दोनों अलग मानसिकताओं के टकराव को लगातार दिलचस्प बनाए रखते हैं। फ़िल्म की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें लगभग संवाद नहीं हैं, फिर भी कहानी अपनी पकड़ नहीं छोड़ती। साइलेंस, एक्सप्रेशंस और बैकग्राउंड टेंशन के सहारे निर्देशक एक प्रभावशाली साइकोलॉजिकल थ्रिलर बनाने में सफल रहते हैं।
पीटर विल्सन का अभिनय फ़िल्म की जान है। मानसिक रूप से टूटे हुए इंसान का दर्द, गुस्सा और हिंसा उन्होंने चेहरे के हाव-भाव से शानदार तरीके से व्यक्त किया है। क्योंकि फ़िल्म में लगभग संवाद नहीं हैं, इसलिए उनके एक्सप्रेशंस ही कहानी को आगे बढ़ाते हैं। सायको किलर के रूप में वह डर पैदा करने में पूरी तरह सफल रहते हैं। कई दृश्यों में उनका शांत चेहरा ही दर्शकों को असहज कर देता है।
ईशा सिंह भी सारा के किरदार में प्रभाव छोड़ती हैं। शुरुआत में उनका किरदार एक गुस्सैल और आत्मनिर्भर महिला के रूप में सामने आता है, लेकिन बच्चे के खतरे में पड़ते ही एक मां की बेचैनी और डर उनके अभिनय में साफ दिखाई देता है। पीटर विल्सन और ईशा सिंह के बीच के फेस-ऑफ दृश्य फ़िल्म के सबसे मजबूत हिस्सों में से हैं। बिना ज्यादा संवादों के भी दोनों कलाकार स्क्रीन पर तनाव बनाए रखते हैं।
‘ऑब्सेस’ रेगुलर कमर्शियल सिनेमा से अलग एक एक्सपेरिमेंटल साइकोलॉजिकल थ्रिलर है। फ़िल्म यह दिखाती है कि सड़क पर हुआ एक पल का गुस्सा किस तरह जिंदगी बदल देने वाली त्रासदी में बदल सकता है। सारा के बच्चे के अपहरण के बाद कहानी और ज्यादा खौफनाक हो जाती है। अगर आप साइको थ्रिलर के दीवाने हैं तो ‘ऑब्सेस’ मूवी आपके लिए हैं।