सिर्फ नॉर्मल ECG रिपोर्ट देखकर यह मान लेना सही नहीं है कि आपका दिल पूरी तरह हेल्दी है। ECG दिल की इलेक्ट्रिकल एक्टिविटी और धड़कन से जुड़ी कई जरूरी जानकारी देता है, लेकिन इससे दिल की हर बीमारी का पता नहीं चलता। डॉक्टरों के अनुसार, हार्ट डिजीज के कई संकेत शुरुआत में काफी हल्के होते हैं, जिन्हें हल्के में नहीं लेना चाहिए। ऐसे में नॉर्मल ECG होने के बावजूद डॉक्टर से सलाह लेकर टेस्ट करवाना जरूरी है।
ECG दिल की इलेक्ट्रिकल एक्टिविटी को रिकॉर्ड करता है और डॉक्टरों को दिल की धड़कन और उसके काम करने के तरीके के बारे में जानकारी देता है। लेकिन सामान्य ECG का मतलब यह नहीं है कि दिल में कोई बीमारी या समस्या नहीं है। कोरोनरी आर्टरी में ब्लॉकेज है या नहीं, इसका पता केवल ECG से नहीं लगाया जा सकता। इसलिए लक्षण होने पर दूसरे जरूरी टेस्ट भी डॉक्टर की सलाह से करानी चाहिए।
दिल की बीमारी हमेशा तेज सीने के दर्द के साथ ही सामने आए, यह जरूरी नहीं है। कई बार शरीर पहले से छोटे-छोटे संकेत देने लगता है। सीढ़ियां चढ़ने पर पहले से ज्यादा सांस फूलना, बिना ज्यादा काम के थकान महसूस होना या आराम करते समय अचानक दिल की धड़कन बढ़ना ऐसे संकेत हो सकते हैं। इन्हें सिर्फ कमजोरी, तनाव या कम फिटनेस समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
कई लोग नॉर्मल ECG रिपोर्ट आने के बाद यह मान लेते हैं कि उनका दिल पूरी तरह स्वस्थ है। इसी वजह से वे शरीर में दिखने वाले दूसरे लक्षणों पर ध्यान नहीं देते। डॉक्टर के मुताबिक, अगर कोई परेशानी बार-बार हो रही है और आराम करने के बाद भी ठीक नहीं हो रही, तो टेस्ट करवाना जरूरी है। नॉर्मल रिपोर्ट के बावजूद लगातार बने रहने वाले लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
डॉ. चंदोला के अनुसार, दिल की बीमारी के शक में ECG और लिपिड प्रोफाइल शुरुआती जांच हो सकती हैं, लेकिन हर व्यक्ति के लिए सिर्फ ये टेस्ट काफी नहीं होते। डॉक्टर मरीज की उम्र, लक्षण, मेडिकल हिस्ट्री और हार्ट डिजीज के रिस्क को देखकर दूसरी टेस्ट की सलाह दे सकते हैं। इनमें कोरोनरी कैल्शियम स्कोर, कोरोनरी आर्टरी की जांच, नींद की क्वालिटी और परिवार में पहले की दिल की बीमारी को भी देखा जा सकता है।
दिल से जुड़े लक्षणों को गंभीर होने का इंतजार करके नहीं छोड़ना चाहिए। अगर बार-बार सांस फूल रही है, लगातार थकान रहती है, धड़कन अचानक तेज होती है या शरीर के किसी हिस्से में असामान्य बेचैनी महसूस होती है, तो डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है। समय पर परेशानी की पहचान होने से सही इलाज शुरू किया जा सकता है और गंभीर स्थिति का रिस्क कम करने में मदद मिल सकती है।