नेपाल में 26 अगस्त को आई भीषण बाढ़ में 1200 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और हजारों लोग अभी भी लापता हैं। ये प्राकृतिक आपदा सिर्फ नेपाल को ही नहीं दहला रही है। इसने पूरे हिमालयी क्षेत्र में एक ऐसी प्राकृतिक समस्या की ओर इशारा किया है जो कभी भी ऐसा ही विस्फोटक रूप धारण कर सकती है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या ऐसा ही खतरा सिक्किम के लिए भी है सैकड़ों ग्लेशियर झीलें हैं। हमारी सहयोगी वेबसाइट फर्स्टपोस्ट के एक एक्सप्लेनर आर्टिकल में बताया गया है कि सिक्किम में करीब 400 छोटी-बड़ी ग्लेशियर झीलें मौजूद हैं। इनमें से 16 झीलों को अत्यधिक संवेदनशील बताया जा रहा है। इनमें से भी 13 उत्तरी सिक्किम में और तीन पश्चिमी सिक्किम में हैं। इस खतरे को देखते हुए पूर्वोत्तर राज्य को हाई अलर्ट पर रखा गया है और तकनीकी निगरानी बढ़ा दी गई है।
ग्लेशियर झीलें क्यों होती हैं खतरनाक और क्या है GLOF?
ग्लेशियर झीलें तब बनती हैं जब पिघलते ग्लेशियरों का पानी प्राकृतिक घाटियों में जमा होने लगता है। ये झीलें बर्फ, चट्टानों और अवसाद से बने प्राकृतिक बांधों के सहारे टिकी रहती हैं। असल खतरा इन प्राकृतिक बांध के टूट जाने के बाद सामने आता है। जब किसी भूस्खलन, हिमस्खलन, भूकंप या बर्फ के अचानक खिसकने से झील पर दबाव पड़ता है तो ये प्राकृतिक बांध टूट सकते हैं। इसके टूटने से झील में मौजूद बहुत ज्यादा पानी काफी तेज स्पीड से नीचे की ओर बहने लगता है। इसे ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड (Glacial Lake Outburst Flood- GLOF) कहा जाता है। यह बाढ़ अपने साथ कीचड़, चट्टानें और पेड़-पौधे बहाकर ले जाती है। ये फ्लैश फ्लड विनाशकारी साबित होती है, ठीक वैसे ही जैसे हमें नेपाल में देखने को मिली।
इस रिपोर्ट में एनडीटीवी के हवाले से बताया गया है कि सिक्किम राज्य राहत आयुक्त रिंजिंग छेवांग ने बताया कि नेपाल की घटना सिक्किम में 2023 में आई आपदा से मिलती-जुलती है। उन्होंने बताया कि नेपाल में एक बड़ा ग्लेशियर खिसककर नदी में गिर गया। इससे नदी का मार्ग अवरुद्ध हुआ और बाद में भयानक बाढ़ आई।
सिक्किम का 2023 का भयानक अनुभव
सिक्किम पहले भी GLOF की तबाही झेल चुका है। अक्टूबर 2023 में सिक्किम की दक्षिण ल्होनक झील का बांध टूट गया था। इससे तीस्ता नदी घाटी में विनाशकारी बाढ़ आ गई थी। इस हादसे में दर्जनों लोगों की जान चली गई थी और कई बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर तबाह हो गए थे। रिंजिंग छेवांग ने NDTV को बताया कि दक्षिण ल्होनक में ग्लेशियर का एक हिस्सा झील में गिर गया था। इसने भारी मात्रा में पानी निकला और वही बाढ़ की वजह बना। वैसे इस हादसे के बाद सिक्किम ने ऐसी स्थितियों से निपटने के लिए अपनी क्षमता और इससे जुड़ी स्टडी पर काफी काम किया है।
कितनी झीलों पर है वास्तविक खतरा?
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के लेटेस्ट आकलन के मुताबिक सिक्किम में 40 उच्च-जोखिम वाली ग्लेशियर झीलों की पहचान की गई है। इनमें से 16 झीलों को क्लासिफाइड किया गया है जबकि 13 अनक्लासिफाइड हैं। क्लासिफाइड झीलों में से 7 को हाई रिस्क कैटिगरी में रखा गया है।
न्यूज18 की रिपोर्ट के मुताबित 16 संवेदनशील झीलों में से 13 का विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन किया गया है। ये करीब 17000 फीट की ऊंचाई पर स्थित हैं। सिक्किम विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के प्रमुख सचिव संदीप तांबे के मुताबिक इन आकलनों में झील की गहराई, पानी की मात्रा, मोराइन (प्राकृतिक बांध) की स्थिरता और हिमस्खलन के खतरे जैसे फैक्टर्स की जांच की जा रही है।
तकनीक और सेंसर्स कैसे कर रहे हैं मदद?
सिक्किम प्रशासन अब पीरियॉडिक इंस्पेक्शन के बजाय झीलों की निरंतर निगरानी पर जोर दे रहा है। NDTV से बातचीत में छेवांग ने बताया कि अधिकतर झीलों में सेंसर्स लगाए गए हैं ताकि यह पता लगाया जा सके कि पानी की मात्रा बढ़ रही है या नहीं। इसके अलावा उत्तरी सिक्किम में ऑटोमेटेड वेदर स्टेशन और अर्ली-वार्निंग सिस्टम स्थापित किए गए हैं। जून में सिक्किम को C-DAC द्वारा विकसित एक स्वदेशी ग्लेशियर-लेक मॉनिटरिंग सिस्टम मिला था। यह सिस्टम पानी के स्तर में बदलाव को रिकॉर्ड कर सैटेलाइट के जरिए मॉनिटरिंग सेंटरों तक पहुंचाता है और बाढ़ के प्रवाह की गति का पूर्वानुमान लगाता है। हालांकि तकनीक ग्लेशियर को खिसकने से नहीं रोक सकती लेकिन यह समय रहते लोगों को सुरक्षित निकालने के लिए चेतावनी जरूर दे सकती है।
जोखिम कम करने के लिए उठाए जा रहे कदम
जोखिम को घटाने के लिए राज्य सरकार कई योजनाओं पर काम कर रही है। न्यूज18 की रिपोर्ट के मुताबिक शाको चू झील में नाजुक मोराइन के पीछे 2.7 करोड़ घन मीटर पानी जमा है। वहां सौर ऊर्जा से चलने वाले पंपों का इस्तेमाल करके झील के जलस्तर को 20 से 40 मीटर तक कम करने पर विचार हो रहा है। इससे करीब 80 लाख घन मीटर पानी कम किया जा सकेगा।
दक्षिण-उत्तर ल्होनक क्लस्टर के लिए करीब 24 किमी नीचे डोलमा समपांग में पत्थर के निर्माण पर स्टडी चल रही है। करीब 300 हेक्टेयर में फैले इस क्षेत्र ने 2023 की बाढ़ के असर को कम करने में मदद की थी। पवित्र माने जाने वाली गुरुडोंगमार झील परिसर में बिना झील को नुकसान पहुंचाए पानी के बहाव को नियंत्रित करने के लिए सुरक्षा दीवार बनाने की योजना है। इसके साथ ही डॉपलर वेदर रडार लगाने के लिए भी स्थानों का चयन किया जा रहा है।