Asaduddin Owaisi: ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के कड़े प्रावधानों को और मजबूत करने में कांग्रेस की भूमिका की कड़ी आलोचना की है। हैदराबाद के सांसद ने आरोप लगाया कि पी चिदंबरम के केंद्रीय गृह मंत्री रहते हुए कांग्रेस द्वारा UAPA में किए गए संशोधनों के कारण उमर खालिद और शरजील इमाम जैसे विद्वानों सहित विचाराधीन कैदियों को लंबे समय तक जेल में रहना पड़ रहा है।
बता दें कि उमर और शरजील को हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली दंगों 2020 से जुड़े 'बड़ी साजिश' मामले में जमानत देने से इनकार कर दिया था।
AIMIM प्रमुख ने गुरुवार को महाराष्ट्र के धुले में आयोजित एक कार्यक्रम में कहा, “सुप्रीम कोर्ट ने दो विचाराधीन आरोपियों को जमानत नहीं दी, और कोर्ट ने जमानत न देने के कारणों का स्पष्टीकरण भी दिया। UPA सरकार के दौरान गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम में संशोधन किया गया था, जिसमें आतंकवाद की परिभाषा को शामिल किया गया था।”
AIMIM प्रमुख ने कहा कि उन्होंने लोकसभा में अपने पूर्व भाषण में यूएपीए के कुछ प्रावधानों पर सवाल उठाते हुए उन्हें "विषयगत" (Subjective) बताया था।
ओवैसी ने कहा, "मैं 2007 या 2008 की बात कर रहा हूं। मैंने संसद में कहा था: 'कृपया मूल अधिनियम की धारा 15 (क) देखें, जिसमें कहा गया है कि 'किसी भी अन्य माध्यम से, चाहे वह किसी भी प्रकार का हो, जिससे नुकसान हो या होने की संभावना हो।' यह एक विषयगत मामला है, और कल अरुंधति रॉय को उनके लेखन के लिए गिरफ्तार किया जा सकता है। यह विषयगत है, और इसे कौन परिभाषित करता है?'"
AIMIM नेता, जो एक प्रशिक्षित वकील भी हैं, ने कहा कि खालिद और इमाम को जमानत देने से इनकार करने का आधार वही था जो उन्होंने अपने लोकसभा भाषण में बताया था।
उन्होंने आगे कहा “इसी आधार ‘किसी भी अन्य माध्यम से’ का इस्तेमाल किया गया, जिसे कांग्रेस ने कानून बनाया था और जिसके बारे में मैंने पहले ही कहा था कि इसका दुरुपयोग होगा। आज दो युवा, जो पांच साल और छह महीने से जेल में हैं, उन्हें जमानत नहीं मिली। इस कानून को बनाने वाले कांग्रेस के ही लोग थे और गृह मंत्री चिदंबरम थे। क्या आजादी के बाद से कांग्रेस का कोई नेता कभी एक साल, दो साल या साढ़े पांच साल के लिए जेल गया है?” ।
ओवैसी ने UAPA की धारा 43D का हवाला दिया, जिसके तहत बिना आरोपपत्र दाखिल किए 180 दिनों तक हिरासत में रखा जा सकता है। उन्होंने दावा किया कि अल्पसंख्यकों को नियमित रूप से अधिकतम अवधि के लिए हिरासत में रखा जाता है।
उन्होंने कहा, “लोकसभा में मेरा यह भाषण रिकॉर्ड किया गया है। मैंने धारा 43D के तहत 180 दिनों की हिरासत की बात की थी: 'मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि जिन मामलों में अल्पसंख्यकों को गिरफ्तार किया जाता है, उनमें से 100 प्रतिशत मामलों में उन्हें बिना आरोपपत्र दाखिल किए 180 दिनों तक हिरासत में रखा जाता है।”