DK Shivakumar News: कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने शनिवार (6 जून) को कहा कि वह ना तो अपने हिंदू धर्म को त्याग सकते हैं और ना ही अपनी पहचान को दरकिनार कर सकते हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि वे सभी धर्मों का सम्मान करते हैं और शपथ ग्रहण समारोह के दौरान हिंदू रीति-रिवाजों का पालन करना राजनीति से प्रेरित नहीं। बल्कि उनकी व्यक्तिगत आस्था का प्रतीक था।
तीन जून को अपने शपथ ग्रहण समारोह के दौरान हिंदू परंपराओं और रीति-रिवाजों का पालन करने के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने पत्रकारों से कहा था, "‘राजनीति मेरे लिए महत्वपूर्ण नहीं है। मेरे लिए महत्वपूर्ण है व्यक्ति और ईश्वर के बीच का संबंध। मंदिर और आस्था इसी संबंध से जुड़े हैं। मैं सभी धर्मों की संस्थाओं का आदर करता हूं, चाहे वे ईसाई हों, सिख हों, बौद्ध हों या हिंदू...।"
मुख्यमंत्री ने कहा कि हर धर्म के लोग धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन करते हैं। साथ ही महत्वपूर्ण अवसरों पर आशीर्वाद मांगते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि राज्य की जिम्मेदारी संभालने से पहले उन्होंने भी इसी तरह सभी धार्मिक नेताओं से आशीर्वाद लिया था।
उन्होंने आगे कहा, "क्या मैं इस राज्य में किसी भी धर्म को छोड़ सकता हूं? क्या मैं अपना नाम बदलकर अपना धर्म त्याग सकता हूं? कोई भी व्यक्ति, चाहे वह किसी भी धर्म का हो, यूं ही अपना धर्म नहीं छोड़ सकता।" क्षेत्र के विकास का जिक्र करते हुए शिवकुमार ने कहा कि इलाके में और सुधार की आवश्यकता को लेकर स्थानीय निकायों और काडू सिद्धेश्वर मठ के साथ चर्चा की गई है।
हिंदूओं को साधने की कोशिश में कांग्रस
जब से डीके शिवकुमार को मुख्यमंत्री के तौर पर चुना गया है, कर्नाटक कांग्रेस के कुछ हिस्सों में उनके हिंदू धर्म को खुलकर अपनाने को लेकर बेचैनी देखी जा रही है। शिवकुमार का बार-बार यह कहना कि वह 'गर्व से हिंदू' हैं। सवाल ये है कि क्या शिवकुमार के कार्यकाल में कर्नाटक में कांग्रेस की राजनीति का अंदाज बदलेगा, खासकर धर्म और हिंदुत्व से जुड़े मुद्दों पर...।
जबकि उनसे पहले के नेता सिद्धारमैया ने अपनी राजनीतिक पहचान संवैधानिक मूल्यों, सामाजिक न्याय और 'अहिंदा' गठबंधन के इर्द-गिर्द बनाई थी। वहीं शिवकुमार को धार्मिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर ज़्यादा मिलनसार रवैया अपनाने वाले नेता के तौर पर देखा जाता है।
पिछले दिनों विधानसभा में उन्होंने खुलकर माना कि स्कूल के दिनों में वे RSS की शाखाओं में जाते थे। उन्होंने दो बार RSS की प्रार्थना 'नमस्ते सदावत्सले' भी की थी। इससे यह धारणा और मजबूत हुई कि उन्हें हिंदुत्व इकोसिस्टम से जुड़े समूहों के साथ जुड़ने में कोई हिचकिचाहट नहीं है। लेकिन उनके साथ करीब से काम करने वालों ने इस बात को सिरे से खारिज कर दिया कि इससे उनके कामकाज के तरीके पर कोई असर पड़ेगा।