Gurugram Water crisis: गुरुग्राम में 2031 तक 52% बढ़ेगी पानी की मांग, हाई कोर्ट ने गिरते भूजल स्तर पर GMDA से मांगी रिपोर्ट

Gurugram Water crisis: पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में दायर एक याचिका के अनुसार, गुड़गांव (गुरुग्राम) में पानी की मांग वर्ष 2031 तक लगभग 52% बढ़ने की संभावना है। फिलहाल पानी सप्लाई कैपिसिटी में लगभग 100 MLD (मिलियन लीटर प्रतिदिन) की कमी है, जिसे पूरा करने के लिए नगर निगम गुरुग्राम (MCG) और निजी बिल्डरों द्वारा ट्यूबवेल का सहारा लिया जा रहा है

अपडेटेड Oct 05, 2026 पर 12:21 PM
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Gurugram Water crisis: एक रिपोर्ट के मुताबिक गुरुग्राम में आने वाले समय में पानी का संकट और गंभीर हो सकता है

Gurugram Water crisis: हरियाणा के गुरुग्राम शहर में तेजी से बढ़ती आबादी और शहरीकरण के बीच पानी का संकट आने वाले वर्षों में और गंभीर हो सकता है। शहर में पानी की मौजूदा मांग करीब 770 MLD (मिलियन लीटर प्रतिदिन) है, जो 2031 तक बढ़कर करीब 1,170 MLD पहुंचने का अनुमान है। यानी अगले पांच वर्षों में पानी की मांग में करीब 52 फीसदी की बढ़ोतरी हो सकती है। दूसरी तरफ, शहर का भूजल स्तर कई इलाकों में जमीन से करीब 40 मीटर नीचे पहुंच चुका है। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में दायर एक याचिका के अनुसार, गुरुग्राम में पानी की मांग वर्ष 2031 तक लगभग 52% बढ़ने की संभावना है।

हाई कोर्ट ने दिखाई सख्ती

फिलहाल पानी सप्लाई कैपिसिटी में लगभग 100 MLD (मिलियन लीटर प्रतिदिन) की कमी है, जिसे पूरा करने के लिए नगर निगम गुरुग्राम (MCG) और निजी बिल्डरों द्वारा ट्यूबवेल का सहारा लिया जा रहा है। हाई कोर्ट ने GMDA के सीईओ पीसी मीणा को निर्देश दिए हैं कि वे सभी संबंधित सरकारी एजेंसियों और हितधारकों के साथ बैठक कर गिरते भूजल स्तर की समीक्षा करें और इसकी रिपोर्ट 8 अक्टूबर को अदालत में पेश करें।


मांग और सप्लाई में पहले से 100 MLD का अंतर

टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक, पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में पर्यावरण कार्यकर्ता सुनील सिंह की ओर से दाखिल लिखित दलीलों में गुरुग्राम के जल संकट से जुड़े ये आंकड़े सामने रखे गए। हाईकोर्ट ने 1 अक्टूबर की सुनवाई में इन दलीलों पर विचार किया। गुरुग्राम महानगर विकास प्राधिकरण यानी GMDA के दो वाटर ट्रीटमेंट प्लांट की कुल क्षमता करीब 670 MLD है, जबकि शहर में पीने के पानी की मौजूदा जरूरत करीब 770 MLD है। इस तरह करीब 100 MLD की कमी बनी हुई है। इस कमी को फिलहाल MCG और निजी बिल्डरों के ट्यूबवेल से निकाले जा रहे भूजल के जरिए पूरा किया जा रहा है।

2026 से 2029 के बीच बढ़ाई जाएगी ट्रीटमेंट क्षमता

राज्य सरकार ने पानी की बढ़ती जरूरत को देखते हुए चरणबद्ध तरीके से वाटर ट्रीटमेंट क्षमता बढ़ाने की योजना बनाई है। योजना के तहत 2026 से 2029 के बीच क्षमता बढ़ाकर करीब 1,170 MLD करने का लक्ष्य है, ताकि 2031 तक अनुमानित मांग को पूरा किया जा सके। अधिकारियों के मुताबिक, शहर के कई हिस्से पहले ही GMDA के पानी के नेटवर्क से जुड़ चुके हैं, जबकि बाकी इलाकों में नेटवर्क का विस्तार करने की योजना है।

भूजल से पानी निकालने की रफ्तार बेहद ज्यादा

सबसे बड़ी चिंता यह है कि पानी की मौजूदा कमी को पूरा करने के लिए गुरुग्राम लगातार भूजल पर निर्भर है। दलीलों के मुताबिक, गुरुग्राम जिले में हर साल करीब 1,185 MLD भूजल निकाला जा रहा है, जबकि सालाना उपलब्ध निकासी योग्य भूजल संसाधन करीब 557 MLD है। इस हिसाब से भूजल दोहन का स्तर 212.77 फीसदी तक पहुंच गया है। यानी जितना भूजल प्राकृतिक तौर पर निकाला जा सकता है, उससे कहीं ज्यादा पानी जमीन से बाहर निकाला जा रहा है।

तेजी से बढ़ा कंक्रीट का फैलाव, घट गए जलाशय

भूजल संकट के पीछे तेजी से बढ़ता शहरीकरण भी बड़ी वजह बताया गया है। मामले में पेश किए गए TERI के आंकड़ों के अनुसार, गुरुग्राम जिले में निर्मित क्षेत्र यानी Built-up Area 2007 में करीब 189.67 वर्ग किलोमीटर था, जो 2019 में बढ़कर 393.54 वर्ग किलोमीटर हो गया। 2025 में इसके करीब 518.86 वर्ग किलोमीटर तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया था। इसके उलट, जल निकायों का क्षेत्र लगातार घटा। 2007 में करीब 55.25 वर्ग किलोमीटर में फैले जल निकाय 2019 तक घटकर सिर्फ 5.34 वर्ग किलोमीटर रह गए।

1,216 जल निकायों में से 390 पूरी तरह खत्म

GMDA के एक सर्वे का हवाला देते हुए दलीलों में बताया गया कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के समक्ष पहले की कार्यवाही के दौरान 1,216 जल निकायों का सर्वे कराया गया था। इनमें से 390 जल निकाय पूरी तरह नष्ट पाए गए और उन्हें वापस हासिल करना संभव नहीं माना गया। वहीं 826 जल निकायों को 2017 में बचाए या पुनर्जीवित किए जाने योग्य माना गया था। सर्वे में करीब 393 एकड़ क्षेत्र में फैले 305 मौजूदा सार्वजनिक जल निकायों और करीब 412 एकड़ में फैले 140 से ज्यादा प्राकृतिक निचले इलाकों की पहचान की गई, जिन्हें बहाल करके भूजल रिचार्ज बढ़ाया जा सकता है।

कई जल निकायों पर कब्जे और प्रदूषण का खतरा

दलीलों में दावा किया गया है कि इन जल निकायों पर अब भी दबाव बना हुआ है। करीब 78 एकड़ में फैले 53 जल निकाय कचरा डालने, जमीन समतल करने, अतिक्रमण, निर्माण या भूमि उपयोग में बदलाव से प्रभावित हैं। वहीं करीब 132 एकड़ में फैले 130 अन्य जल निकाय बिना उपचार वाले सीवेज, औद्योगिक प्रदूषण या दूसरे गंदे पानी से प्रभावित या खतरे में हैं। इसके अलावा सरकारी एजेंसियों के संयुक्त स्वामित्व वाले 123 जल निकायों की पहचान सीमांकन, चारदीवारी और सफाई के लिए की गई है, लेकिन दलीलों के मुताबिक यह काम अभी तक पूरा नहीं हुआ।

सीवेज के पानी को दोबारा इस्तेमाल करने पर जोर

गुरुग्राम के ताजे पानी पर दबाव कम करने के लिए उपचारित सीवेज यानी Treated Wastewater के इस्तेमाल का भी प्रस्ताव रखा गया है। HSPCB के रिकॉर्ड के मुताबिक, जनवरी 2026 में करीब 300 MLD सीवेज धनवापुर STP तक पहुंच रहा था। करीब 300 MLD उपचारित पानी के इस्तेमाल की क्षमता वाला सिंचाई नेटवर्क भी तैयार किया जा चुका है, लेकिन सभी ट्रीटेड पानी के निर्धारित मानकों पर खरे नहीं उतरने के कारण इसका पूरी तरह इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है। राज्य सरकार ने धनवापुर समेत चार बड़े STP से उपचारित पानी का इस्तेमाल करीब 28,000 एकड़ जमीन की सिंचाई के लिए करने को मंजूरी दी है। इस परियोजना की अनुमानित लागत 282.13 करोड़ रुपये है।

बोरवेल पर रोक लगाने का प्रस्ताव

दलीलों में गुरुग्राम में भूजल निकालने वाले सभी बोरवेल पर रोक लगाने का भी प्रस्ताव रखा गया है। इसमें रजिस्टर्ड, अनुमति प्राप्त और अवैध बोरवेल सभी शामिल हैं। प्रस्ताव के मुताबिक, मौजूदा बोरवेल की पहचान कर उन्हें जियो-टैग और समयबद्ध तरीके से सील किया जाए। इस प्रक्रिया के दौरान भूजल निकासी से जुड़ी मौजूदा अनुमति और NOC को भी निलंबित रखने की बात कही गई है। साथ ही नए बोरवेल की अनुमति, पुराने परमिट के नवीनीकरण या निर्धारित मात्रा से अधिक भूजल निकालने की अनुमति नहीं देने का प्रस्ताव है।

हाईकोर्ट ने बुलाई सभी एजेंसियों की बैठक

गुरुग्राम में बिगड़ती भूजल स्थिति को देखते हुए हाईकोर्ट ने GMDA के CEO पीसी मीणा को सरकारी एजेंसियों और अन्य संबंधित पक्षों की बैठक बुलाने का निर्देश दिया है। बैठक में शहर के भूजल संकट पर विस्तार से चर्चा होगी और इसके परिणाम को 8 अक्टूबर को हाईकोर्ट के सामने रखा जाना है। मामले में यह भी सवाल उठाया गया है कि जब तक शहर के लिए भूजल पर निर्भर हुए बिना पानी का पक्का और टिकाऊ स्रोत सुनिश्चित नहीं हो जाता, तब तक गुरुग्राम में आगे नए निर्माण या विकास को बढ़ाने की अनुमति दी जानी चाहिए या नहीं।

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