Har ki Pauri: उत्तराखंड के हरिद्वार में स्थित पवित्र हर-की-पौड़ी क्षेत्र में शुक्रवार को कई जगहों पर ऐसे होर्डिंग्स और पोस्टर लगाए गए है जिन पर लिखा है कि, 'गैर-हिंदुओं का प्रवेश वर्जित है'। यह कदम 'गंगा सभा' द्वारा उठाया गया है, जो ब्रह्मकुंड और आसपास के घाटों की प्रबंधन करती है। घाटों को लेकर यह विवाद ऐसे समय में गहराया है जब राज्य सरकार पहले से ही इस क्षेत्र में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने की मांग पर विचार कर रही है।
गंगा सभा ने 1916 के नियमों का दिया हवाला
गंगा सभा के अध्यक्ष नितिन गौतम और सचिव उज्ज्वल पंडित ने इस कदम का बचाव करते हुए कई बातें कही हैं। उन्होंने 1916 में पंडित मदन मोहन मालवीय के मार्गदर्शन में बने हरिद्वार नगर पालिका के उपनियमों का हवाला दिया। उनके अनुसार, इन प्रावधानों में हर-की-पौड़ी क्षेत्र में गैर-हिंदुओं के प्रवेश, निवास और व्यावसायिक गतिविधियों पर प्रतिबंध की बात कही गई है। गंगा सभा का कहना है कि घाटों की धार्मिक शुचिता और गरिमा बनाए रखने के लिए यह प्रतिबंध आवश्यक है। उन्होंने सरकार से यह भी अनुरोध किया है कि हर-की-पौड़ी पर ड्यूटी के लिए गैर-हिंदू पुलिस कर्मियों या अधिकारियों को तैनात न किया जाए।
राज्य सरकार और राजनीतिक दलों का रुख
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस मुद्दे की संवेदनशीलता को देखते हुए स्पष्ट किया है कि हरिद्वार की ऐतिहासिक और धार्मिक गरिमा को बनाए रखने के लिए सरकार सभी मौजूदा कानूनों और नियमों की गहन समीक्षा कर रही है। उन्होंने कहा कि, इसके लिए संतों और अन्य हितधारकों से निरंतर चर्चा जारी है। जहां एक ओर उत्तराखंड बीजेपी अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने इसे दशकों पुरानी परंपरा और सनातन भावनाओं का सम्मान बताते हुए समर्थन किया है, वहीं विपक्ष ने इसे लेकर सवाल खड़े किए है। पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष सतपाल ब्रह्मचारी ने इसे बहु-धार्मिक समाज में अव्यावहारिक बताया है, जबकि समाजवादी पार्टी के नेता एस.टी. हसन ने इसे असंवैधानिक और समाज में नफरत फैलाने वाला कदम करार देते हुए कहा है कि संविधान के अनुसार हर भारतीय को देश के किसी भी हिस्से में जाने की आजादी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के पोस्टर लगने से आगामी अर्ध कुंभ की तैयारियों और कानून-व्यवस्था पर असर पड़ सकता है। यह मामला अब भारतीय संविधान के 'स्वतंत्र आवाजाही के अधिकार' और धार्मिक संस्थानों की 'अपनी परंपराएं बनाए रखने की स्वायत्तता' के बीच की कानूनी बहस बन गया है। विपक्ष का आरोप है कि ऐसे विवाद विकास और कुंभ के बेहतर इंतजामों से ध्यान भटकाते हैं।