शहरों में हीटवेव का खतरा ग्रामीण इलाकों से ज्यादा, बचने के लिए अपनाने होंगे ये तरीके
शहरों में हीटवेव का असर ग्रामीण इलाकों से ज्यादा खतरनाक हो रहा है। अर्बन हीट आइलैंड के कारण तापमान ऊंचा बना रहता है। जानिए क्यों बढ़ रहा है खतरा और इससे बचने के आसान और असरदार तरीके क्या हैं।
हीटवेव से निपटने के लिए केवल तात्कालिक उपाय काफी नहीं हैं।
भारत समेत दुनिया के ज्यादातर हिस्सों में गर्मी का प्रकोप काफी ज्यादा बढ़ गया है। और अब गर्मी को लेकर नजरिया तेजी से बदल रहा है। जो कभी सिर्फ मौसम की असुविधा मानी जाती थी, वह अब करोड़ों लोगों के लिए लगातार खतरा बन चुकी है। भारत में हीटवेव अब कुछ दिनों की घटना नहीं रही, बल्कि बदलते जलवायु की हकीकत बन गई है।
WHO के मुताबिक, उत्तर भारत में हर साल 5 से 6 हीटवेव आती हैं, जो कई बार हफ्तों तक चलती हैं और एक के बाद एक आती रहती हैं। यानी अब सिर्फ तापमान ही नहीं बढ़ रहा, बल्कि गर्मी का असर ज्यादा लंबा और लगातार हो गया है, जहां रात में भी राहत नहीं मिलती।
हीटवेव की असली समस्या
रोटरी इंटरनेशनल की रोटरी पास्ट डिस्ट्रिक्ट गवर्नर स्वाति हरकल का कहना है कि हीटवेव की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि यह धीरे-धीरे असर करती है। यह अचानक आने वाली आपदा की तरह नहीं होती, बल्कि समय के साथ शरीर पर दबाव बढ़ाती है। इसी वजह से डिहाइड्रेशन, हीट एग्जॉशन और हीटस्ट्रोक के मामले लगातार बढ़ते हैं।
बुजुर्ग, छोटे बच्चे और पहले से बीमार लोग सबसे ज्यादा जोखिम में रहते हैं। जैसे दिल, सांस या किडनी की समस्या वाले। इसके अलावा, किसान, निर्माण मजदूर और सड़क पर काम करने वाले लोग भी ज्यादा प्रभावित होते हैं। क्योंकि उनके पास खुद को बचाने के पर्याप्त साधन नहीं होते।
शहरों में क्यों ज्यादा गंभीर है स्थिति
स्वाति का कहना है कि दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े शहरों में यह समस्या और ज्यादा गंभीर हो जाती है। इसकी वजह है 'अर्बन हीट आइलैंड' इफेक्ट। कंक्रीट की इमारतें और कम हरियाली दिन में गर्मी को अपने अंदर जमा कर लेती हैं और रात में धीरे-धीरे छोड़ती हैं।
इससे शहरों का तापमान आसपास के ग्रामीण इलाकों से ज्यादा बना रहता है और रात में भी ठंडक नहीं मिलती। यही वजह है कि शहरों में रहने वाले लोगों पर हीटवेव का असर ज्यादा दिखता है।
धीरे-धीरे बढ़ने वाली आपदा
बाढ़ या तूफान की तरह हीटवेव तुरंत नुकसान नहीं करती, बल्कि धीरे-धीरे शरीर को प्रभावित करती है। इसे 'धीरे-धीरे बढ़ने वाली आपदा' कहा जाता है। WHO के अनुसार, अब एक बड़ी समस्या यह है कि रात में तापमान कम नहीं होता।
जब शरीर को रात में भी आराम नहीं मिलता, तो डिहाइड्रेशन, हीटस्ट्रोक और दिल से जुड़ी समस्याओं के मामले तेजी से बढ़ जाते हैं।
अब हीटवेव को सिर्फ एक इमरजेंसी की तरह देखना काफी नहीं है। इसके लिए लंबी अवधि की तैयारी और रोकथाम जरूरी है। सबसे जरूरी बात यह समझना है कि ठंडक अब कोई लग्जरी नहीं, बल्कि जरूरत बन चुकी है।
हीटवेव का हल क्या हो सकता है
हीटवेव से निपटने के लिए केवल तात्कालिक उपाय काफी नहीं हैं। इसके लिए बड़े स्तर पर बदलाव की जरूरत है। स्वाति का कहना है कि इसमें प्रकृति आधारित समाधान और नीतिगत कदम दोनों शामिल हों।
प्रकृति का समाधान: शहरों में पेड़ लगाना सबसे आसान और असरदार तरीका है। एक बड़ा पेड़ लगभग 10 एसी जितनी ठंडक दे सकता है। मियावाकी फॉरेस्ट जैसे घने और स्थानीय पौधों वाले छोटे जंगल शहरों में तापमान को 5 डिग्री तक कम कर सकते हैं।
अगर इन्हें इमारतों के पास लगाया जाए, तो इससे बिजली की खपत भी कम हो सकती है और आसपास का तापमान भी नियंत्रित रहता है।
व्यक्तिगत और सामुदायिक कदम: लोगों को छाछ और आम पन्ना जैसे पारंपरिक पेय अपनाने चाहिए, जो शरीर में नमक और पानी की कमी को पूरा करते हैं। घरों में 'कूल रूफ' पेंट लगाने से बिना बिजली के 3 से 5 डिग्री तक तापमान कम किया जा सकता है।
इसके साथ ही चक्कर आना, कमजोरी या उल्टी जैसे शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, क्योंकि यही आगे चलकर गंभीर स्थिति बन सकते हैं।
नीति स्तर पर बदलाव
स्वाति का कहना है कि नगर निकायों को हीट एक्शन प्लान लागू करना चाहिए। इसमें मजदूरों के लिए अनिवार्य आराम का समय तय करना और सार्वजनिक 'कूलिंग सेंटर' बनाना जरूरी है, ताकि लोग तेज गर्मी से बच सकें।
Disclaimer: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए सलाह या विचार एक्सपर्ट के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदायी नहीं है। यूजर्स को मनीकंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निर्णय लेने से पहले हमेशा सर्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।