विजय नहीं बना पाएंगे सरकार तो क्या तमिलनाडु में फिर से होंगे चुनाव? स्टालिन और AIADMK के बीच का नया खेल भी जान लीजिए
Tamil Nadu Political Crisis: विजय के लिए असली चुनौती सिर्फ सीटें जीतना नहीं, बल्कि सरकार को स्थिरता देना है। वहीं, स्थापित पार्टियों (DMK-AIADMK) के लिए यह अपने वजूद को बचाने की लड़ाई बन गई है। लेकिन बहुमत के आंकड़ों और संवैधानिक नियमों ने इस मुकाबले को और भी पेचीदा बना दिया है
विजय नहीं बना पाएंगे सरकार तो क्या तमिलनाडु में फिर से होंगे चुनाव? स्टालिन और AIADMK के बीच का नया खेल भी जान लीजिए
तमिलनाडु की राजनीति आज एक ऐतिहासिक मोड़ पर है। अभिनेता से राजनेता बने विजय की पार्टी तमिलगा वेट्री कझगम (TVK) ने पहली ही बार में चुनावी बिसात बिछा दी है। लेकिन बहुमत के आंकड़ों और संवैधानिक नियमों ने इस मुकाबले को और भी पेचीदा बना दिया है। इस वक्त तमिलनाडु की राजनीति में क्या कुछ चल रहा है, आइए आपको बताते हैं।
विजय का 'मैजिक नंबर' से फासला: क्या है चुनौती?
तमिलनाडु विधानसभा में बहुमत के लिए जादुई आंकड़ा 118 है। हालांकि विजय की पार्टी TVK सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है, लेकिन वह बहुमत से करीब 5-6 सीटें पीछे रह सकती है।
यह स्थिति विजय के लिए एक बड़ी परीक्षा है। क्या वे अन्य छोटी पार्टियों या निर्दलीयों को अपने पाले में ला पाएंगे? उनकी राजनीति का मुख्य आधार 'द्रविड़ राजनीति का विकल्प' बनना है, ऐसे में किसी बड़ी पार्टी से हाथ मिलाना उनके समर्थकों के बीच गलत संदेश दे सकता है।
हालांकि TVK ने आधिकारिक तौर पर 108 सीटें जीतीं, लेकिन सरकार बनाने का दावा करते हुए पार्टी ने गवर्नर राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर को 107 विधायकों (जिनमें विजय भी शामिल हैं) के हस्ताक्षर सौंपे। गवर्नर को कांग्रेस के पांच विधायकों के समर्थन के बारे में भी जानकारी दी गई।
234 सदस्यों वाली विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 118 होने के कारण, TVK को फिलहाल बहुमत का आंकड़ा पार करने के लिए और विधायकों के समर्थन की जरूरत है।
अब सबका ध्यान तीन पार्टियों पर चला गया है- विदुथलाई चिरुथाइगल काची (VCK), CPI और CPM- जिनमें से हर पार्टी के पास दो-दो विधायक हैं।
कुल मिलाकर, इन तीनों पार्टियों के पास छह सीटें हैं, ठीक उतनी ही सीटें जितनी TVK को अब जरूरत है, क्योंकि कांग्रेस ने उसे अपना समर्थन दे दिया है।
TVK ने इन तीनों पार्टियों को औपचारिक रूप से पत्र लिखकर सरकार बनाने के लिए उनका समर्थन मांगा है।
VCK ने बताया कि उसे TVK से एक आधिकारिक पत्र मिला है, जिसमें समर्थन देने का अनुरोध किया गया है। हालांकि, VCK के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि पार्टी चेन्नई में होने वाली एक उच्च-स्तरीय बैठक में इस पर अपना अंतिम फैसला लेगी।
DMK-AIADMK का नया समीकरण: पुरानी दुश्मनी, नया डर?
राजनीति के गलियारों में सबसे चौंकाने वाली चर्चा यह है कि क्या दशकों पुराने दुश्मन DMK और AIADMK एक साथ आ सकते हैं? खबरों के मुताबिक, AIADMK ने DMK के सामने सहयोग का हाथ बढ़ाया है ताकि विजय को सत्ता से दूर रखा जा सके।
TOI की एक रिपोर्ट के अनुसार, DMK प्रमुख एम.के. स्टालिन ने विधायी दल की बैठक के दौरान विधायकों को बताया कि AIADMK ने सरकार बनाने और विजय को सत्ता संभालने से रोकने के लिए समर्थन मांगा है। इसके बाद विधायकों ने इस मुद्दे पर अंतिम निर्णय लेने के लिए स्टालिन को अधिकृत कर दिया।
अब मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन के लिए यह एक 'धर्मसंकट' है। अगर वे AIADMK का समर्थन लेते हैं, तो विपक्षी दलों के बीच उनकी साख पर सवाल उठेंगे। लेकिन अगर विजय सत्ता में आते हैं, तो यह राज्य की पारंपरिक द्रविड़ राजनीति के अंत की शुरुआत हो सकती है।
स्टालिन, जिन्होंने शुरू में AIADMK का समर्थन करने के विचार का विरोध किया था, माना जा रहा है कि पार्टी के वरिष्ठ दूसरी पंक्ति के नेताओं के साथ विचार-विमर्श के बाद उन्होंने इस विकल्प पर पुनर्विचार किया है। बाद में उन्होंने CPI(M) के प्रदेश सचिव पी. शनमुगम, CPI के प्रदेश सचिव एम. वीरपांडियन और VCK नेता थोल थिरुमावलवन को चर्चा के लिए भी बुलाया है।
DMK और AIADMK के बीच किसी संभावित तालमेल का समर्थन करने की संभावना के बारे में पूछे जाने पर, VCK के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, "जब TVK के नाम पर खतरा मौजूद है, तो फिर AIADMK और DMK मिलकर एक स्थिर सरकार क्यों नहीं बनाते?"
संवैधानिक पेच: अगर सरकार न बनी तो क्या होगा?
भारतीय संविधान ऐसी स्थिति के लिए स्पष्ट नियम प्रदान करता है। अगर कोई भी दल बहुमत साबित नहीं कर पाता, तो स्थिति 'हंग असेंबली' (त्रिशंकु विधानसभा) की कहलाती है। इसके बाद क्या रास्ता बचता है, वो इस प्रकार है-
राज्यपाल की भूमिका: राज्यपाल सबसे बड़े दल के नेता (विजय) को सरकार बनाने का न्योता दे सकते हैं और उन्हें सदन के पटल पर बहुमत साबित करने के लिए समय दे सकते हैं।
अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन): अगर राज्यपाल को विश्वास हो जाता है कि कोई भी दल स्थिर सरकार नहीं दे पाएगा, तो वे राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश कर सकते हैं।
मध्यावधि चुनाव: राष्ट्रपति शासन के दौरान अगर छह महीने के भीतर कोई गठबंधन नहीं बनता, तो राज्य में दोबारा चुनाव कराने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा।
विजय के लिए असली चुनौती सिर्फ सीटें जीतना नहीं, बल्कि सरकार को स्थिरता देना है। वहीं, स्थापित पार्टियों (DMK-AIADMK) के लिए यह अपने वजूद को बचाने की लड़ाई बन गई है।
फिलहाल तमिलनाडु इस समय 'वेट एंड वॉच' की स्थिति में है। क्या विजय गठबंधन की राजनीति में माहिर साबित होंगे, या द्रविड़ दिग्गज एक साथ आकर उन्हें रोक लेंगे? अगले कुछ दिन राज्य का भविष्य तय करेंगे।