India First Hydrogen Train: जींद-सोनीपत के बीच चलने जा रही पहली हाइड्रोजन ट्रेन, इलेक्ट्रिक और डीजल ट्रेन से इसमें क्या फर्क?
India First Hydrogen Train: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जींद रेलवे स्टेशन से जींद और सोनीपत के बीच देश की पहली हाइड्रोजन से चलने वाली ट्रेन को हरी झंडी दिखाकर रवाना करेंगे। इस शुरुआत के साथ ही भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों के खास क्लब में शामिल हो जाएगा जहां हाइड्रोजन से चलने वाली ट्रेनें चल रही हैं
India First Hydrogen Train: पारंपरिक डीजल और इलेक्ट्रिक ट्रेनों की तुलना में हाइड्रोजन ट्रेन कई मामलों में पूरी तरह से अलग है
India's First Hydrogen Train: भारतीय रेलवे के इतिहास में शुक्रवार का दिन एक बेहद ऐतिहासिक स्वर्णिम अध्याय जोड़ने जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जींद रेलवे स्टेशन से जींद और सोनीपत के बीच देश की पहली हाइड्रोजन से चलने वाली ट्रेन को हरी झंडी दिखाकर रवाना करेंगे। इस शुरुआत के साथ ही भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों के खास क्लब में शामिल हो जाएगा जहां हाइड्रोजन से चलने वाली ट्रेनें चल रही हैं।
यह ट्रेन पूरी तरह से हाइड्रोजन फ्यूल सेल टेक्नोलॉजी पर चलती है। लेकिन आम लोगों के मन में यह सवाल जरूर है कि आखिर यह ट्रेन पारंपरिक डीजल और बिजली से चलने वाली ट्रेनों से कितनी और कैसे अलग है? आइए जानते हैं इस हाइड्रोजन ट्रेन की पूरी तकनीक, इसके फीचर्स और डीजल-इलेक्ट्रिक ट्रेनों से इसके बड़े अंतर को।
डीजल और इलेक्ट्रिक ट्रेन से यह कितनी अलग है?
पारंपरिक डीजल और इलेक्ट्रिक ट्रेनों की तुलना में हाइड्रोजन ट्रेन कई मामलों में पूरी तरह से अलग है:-
1- जीरो कार्बन एमिशन
डीजल इंजन भारी मात्रा में धुआं और कार्बन छोड़ता है जिससे एयर पल्यूशन फैलता है। हाइड्रोजन ट्रेन ट्रेन पूरी तरह पर्यावरण के अनुकूल है। इसमें हाइड्रोजन को बिजली में बदला जाता है। बाई प्रोडक्ट के रूप में सिर्फ पानी की भाप निकलती है। इस प्रक्रिया में कार्बन का उत्सर्जन जीरो होता है।
2- ओवरहेड तारों की जरूरत नहीं
बिजली से चलने वाली ट्रेनों को लगातार बिजली सप्लाई के लिए पटरियों के ऊपर ओवरहेड बिजली के तारों की जरूरत होती है। हाइड्रोजन ट्रेन को किसी भी तरह के ओवरहेड तारों की जरूरत नहीं होती है। इसके बजाय ट्रेन के भीतर लगे हाइड्रोजन फ्यूल सेल से ही जरूरत की बिजली खुद जेनरेट होती है। इससे कोयले जैसे जीवाश्म ईंधन पर आधारित थर्मल पावर प्लांटों से मिलने वाली बिजली पर निर्भरता काफी कम हो जाती है।
3- बेहद कम शोर
डीजल लोकोमोटिव इंजनों की तुलना में हाइड्रोजन ट्रेन बेहद कम शोर करती है। इससे यात्रियों का सफर काफी शांत और आरामदायक होगा।
इस हाइड्रोजन ट्रेन में और भी अनोखी बातें
भारतीय रेलवे की यह पहली हाइड्रोजन ट्रेन कई मॉर्डर्न टेक्नोलॉजी से लैस है। इस ट्रेन में कुल 10 कोच दिए गए हैं। ये मौजूदा समय विकसित की गई दुनिया की सबसे लंबी हाइड्रोजन से चलने वाली यात्री ट्रेनों में से एक है। यह ट्रेन 3200 HP (हॉर्सपावर) प्रोपल्शन सिस्टम से लैस है। ये ताकत इसे दुनिया की सबसे शक्तिशाली हाइड्रोजन ट्रेनों की श्रेणी में खड़ा करता है।
शून्य-उत्सर्जन नियमों का पालन करने के साथ-साथ इसकी हॉर्सपावर और खिंचाव क्षमता काफी मजबूत है। इसे इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह पारंपरिक डीजल इंजनों के प्रदर्शन की बराबरी कर सके। इसका इस्तेमाल औद्योगिक, शंटिंग, इंटरमॉडल और हैवी-हॉल ऑपरेशन्स के लिए भी किया जा सकता है।
सुरक्षा व्यवस्था और रिफ्यूलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर
हाइड्रोजन बेहद संवेदनशील ईंधन है, इसलिए ट्रेन और रिफ्यूलिंग केंद्रों पर सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं। ट्रेन के संचालन को सुचारू बनाए रखने के लिए भारतीय रेलवे ने ईंधन भरने के लिए एक हाइड्रोजन कंप्रेशन सिस्टम, तकनीकी सहायता इंफ्रास्ट्रक्चर और महत्वपूर्ण स्पेयर पार्ट्स स्थापित किए हैं।
इसके अलावा बिना किसी रुकावट के काम सुनिश्चित करने के लिए एक स्टैंडबाय कंप्रेसर यूनिट भी दी गई है। जहां हाइड्रोजन का उत्पादन, स्टोरेज और वितरण (डिस्पेंसिंग) किया जाएगा वहां हाइड्रोजन लीक डिटेक्टर, फ्लेम डिटेक्टर और दूसरे सुरक्षा सेंसर लगाए गए हैं। सुरक्षित और विश्वसनीय कामकाज के लिए इन प्रणालियों की नियमित जांच और सफाई की जाएगी।
स्मार्ट ऑपरेशन और ड्राइवर-फ्रेंडली डिजाइन
इस ट्रेन में रख-रखाव के खर्च और समय को बचाने के लिए आधुनिक तकनीकों का भरपूर इस्तेमाल किया गया है। इसमें रीजनरेटिव ब्रेकिंग सिस्टम लगा है। यह ब्रेक लगाने के दौरान उत्पन्न होने वाली ऊर्जा को स्टोर कर लेता है। इससे ट्रेन की कार्यकुशलता और इसकी परिचालन सीमा बढ़ जाती है। ट्रेन में इंटीग्रेटेड हाइड्रोजन फ्यूल सेल मैनेजमेंट सिस्टम दिया गया है। ये लगातार फ्यूल सेल के तापमान और उसकी हेल्थ की निगरानी करता रहता है। रियल टाइम का डेटा, फॉल्ट डिटेक्शन और सेल्फ-डायग्नोस्टिक्स की सुविधा दी गई है ताकि मेंटेनेंस का काम आसान हो सके और ट्रेन का डाउनटाइम कम रहे।
इसके मॉड्यूलर डिजाइन में पहले से असेंबल की गई बैटरी बैंक और कंट्रोल सिस्टम शामिल हैं। इसे भविष्य में अपग्रेड करना बेहद आसान होगा। कंप्रेशर्स और ट्रैक्शन मोटर ब्लोअर जैसे उपकरण इलेक्ट्रिकली संचालित हैं, जिससे घूमने वाले मैकेनिकल पार्ट्स पर निर्भरता कम होती है और रखरखाव का खर्च भी घटता है।
#AwaazExclusive | भारत की पहली हाइड्रोजन फ्यूल सेल ट्रेन तैयार
- 17 जुलाई को प्रधानमंत्री दिखाएंगे हरी झंडी - हरियाणा के जींद-सोनीपत रूट से होगी शुरुआत - 10 कोच और करीब 2,600 यात्रियों की क्षमता पूरी डिटेल बता रही हैं हैं दीपाली नंदा।@deepalinanda#Hydrogentrain… pic.twitter.com/jWKR8j11m8 — CNBC-AWAAZ (@CNBC_Awaaz) July 16, 2026
इस लोकोमोटिव का केबिन ड्राइवरों के अनुकूल डिजाइन किया गया है। इसका ऑपरेटिंग अनुभव काफी हद तक डीजल लोकोमोटिव जैसा ही है। लेकिन ड्राइवरों के लिए अतिरिक्त आरामदायक फीचर्स जोड़े गए हैं। यह प्लेटफॉर्म काफी लचीला है जिससे जरूरत पड़ने पर 4-एक्सल और 6-एक्सल वाले लोकोमोटिव दोनों को बैटरी और चार्जर कॉन्फ़िगरेशन के साथ बदला जा सकता है।