India-Nepal Border: भारत और नेपाल के बीच सदियों पुराना 'बेटी-रोटी' का संबंध अब सियासी और आर्थिक बदलावों की भेंट चढ़ता दिख रहा है। नेपाल में नई सरकार के गठन के बाद सीमावर्ती इलाकों में व्यापारिक समीकरण तेजी से बदल गए हैं। बिहार के सीतामढ़ी से सटे सीमावर्ती भारतीय बाजारों की रौनक गायब हो गई है, जिसका मुख्य कारण नेपाल सरकार का नया 'टैक्स' नियम है।
100 रुपये के सामान पर भी 'भंसार टैक्स'
नेपाल सरकार ने सीमा पार से आने वाले सामानों पर सख्ती बढ़ा दी है। अब छोटे-से-छोटे सामान पर भी सीमा शुल्क के तौर पर 'भंसार टैक्स' वसूला जा रहा है। स्थिति यह है कि अब मात्र 100 रुपये मूल्य के सामान पर भी टैक्स देना पड़ रहा है। तराई क्षेत्र में रहने वाले नेपाली नागरिक अपनी रोजमर्रा की जरूरतों जैसे- राशन, कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए भारतीय बाजारों पर निर्भर थे, लेकिन अब अतिरिक्त शुल्क के डर से उन्होंने सीमा पार आना कम कर दिया है।
सीतामढ़ी जिले की लगभग 84 किलोमीटर लंबी सीमा नेपाल से जुड़ी हुई है। इस पूरी बेल्ट में 30 से ज्यादा ऐसे प्रमुख बाजार हैं, जिनकी अर्थव्यवस्था पूरी तरह नेपाली ग्राहकों पर टिकी है। भारतीय बाजारों में सामान सस्ता होने के कारण नेपाली नागरिक यहां भारी संख्या में आते थे। अब सख्ती बढ़ने से स्थानीय दुकानदारों की बोहनी तक मुश्किल हो गई है।
राहुल कुमार सिंह और रामाशीष कुशवाहा जैसे नेपाली नागरिकों का कहना है कि सीमा पर बढ़ी कड़ाई और टैक्स के बोझ ने उनके लिए भारत से खरीदारी करना अब घाटे का सौदा बना दिया है।
'बेटी-रोटी' के रिश्तों में कड़वाहट?
भारत और नेपाल के बीच न केवल व्यापारिक, बल्कि गहरे सामाजिक और पारिवारिक संबंध भी हैं। नेपाल के तराई क्षेत्रों के लिए सीतामढ़ी के बाजार भौगोलिक रूप से काफी करीब हैं। जानकारों का मानना है कि नेपाल में सत्ता परिवर्तन के बाद नियमों में आई यह सख्ती दोनों देशों के जमीनी संबंधों को प्रभावित कर रही है।
स्थानीय अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका
इन 30 बाजारों में सिर्फ व्यापार ही नहीं, बल्कि रोजगार भी नेपाली ग्राहकों पर निर्भर है। अगर यह सख्ती लंबे समय तक जारी रही, तो सीमावर्ती इलाकों में बड़े पैमाने पर पलायन और बेरोजगारी बढ़ने का खतरा है। स्थानीय व्यापारियों ने सरकार से इस मुद्दे पर नेपाल के अधिकारियों के साथ बातचीत करने की मांग की है।