अमेरिकी दूतावास ने शुक्रवार को बताया कि भारतीय सेना ने अमेरिका की फॉरेन मिलिट्री सेल्स (FMS) प्रक्रिया के जरिए अमेरिका में बनी जैवलिन एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल सिस्टम खरीदने के लिए लेटर ऑफ़ ऑफर एंड एक्सेप्टेंस (LOA) पर साइन किया है। इस बात की जानकारी अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने की। उन्होंने भारत के इस फैसले को दोनों देशों के बीच रक्षा संबंधों को मजबूत करने वाला एक बड़ा कदम बताया है।
X पर लिखें अपने एक पोस्ट में गोर ने कहा "बड़ी खबर! भारत युद्ध में परखा हुआ जैवलिन एंटी-टैंक सिस्टम खरीदने की योजना बना रहा है।" उन्होंने इसे "अमेरिका-भारत रक्षा संबंधों में एक बड़ा कदम" बताया और कहा कि इस घटना से "संयुक्त उत्पादन (को-प्रोडक्शन)की संभावनाओं के रास्ते खुलते हैं।" गोर ने आगे कहा,"दोनों देशों के बीच सहयोग का स्तर रिकॉर्ड ऊंचाई पर है!"
अमेरिकी दूतावास ने LOA पर हस्ताक्षर किए जाने की पुष्टि करते हुए कहा कि यह अहम कदम "अमेरिका और भारतीय सशस्त्र बलों के बीच मजबूत साझेदारी को दिखाता है और अमेरिका तथा भारत के रक्षा उद्योगों के बीच भविष्य में सहयोग के रास्ते खोलता है।"
अमेरिकी दूतावास ने कहा कि LOA पर हस्ताक्षर होने से आपसी फायदे वाले को-प्रोडक्शन और भारत तथा अमेरिका के रक्षा औद्योगिक आधार को मजबूत करने के मकसद से अन्य मौकों पर बातचीत का रास्ता भी खुलेगा।
LOA पर यह हस्ताक्षर नवंबर 2025 में अमेरिका द्वारा भारत को जैवलिन एंटी-टैंक मिसाइल सिस्टम और एक्सकैलिबर गाइडेड आर्टिलरी म्यूनिशन की प्रस्तावित बिक्री को मंजूरी दिए जाने के बाद हुआ है।
जैवलिन सिस्टम को 'जैवलिन जॉइंट वेंचर'ने बनाया है,जो RTX और लॉकहीड मार्टिन के बीच एक पार्टनरशिप है। यह एक एडवांस्ड,मीडियम-रेंज फायर-एंड-फॉरगेट एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल सिस्टम है। इसे बख्तरबंद गाड़ियों और मज़बूत ठिकानों समेत कई तरह के टारगेट को निशाना बनाने के लिए डिजाइन किया गया है। फायर-एंड-फॉरगेट खूबी की वजह से मिसाइल लॉन्च होने के बाद खुद ही अपने टारगेट की ओर बढ़ सकती है। इससे ऑपरेटर को मिसाइल को लगातार गाइड करने के बजाय अपनी जगह बदलने या सुरक्षित कवर लेने का मौका मिल जाता है।
जैवलिन की एक बड़ी विशेषता इसकी टॉप-अटैक'क्षमता है,जिससे मिसाइल बख्तरबंद गाड़ी पर ऊपर से हमला कर सकती है। जहां आमतौर पर आर्मर प्रोटेक्शन कमजोर होता है। इस सिस्टम का इस्तेमाल कुछ खास लक्ष्यों के खिलाफ सीधे हमले में भी किया जा सकता है। इस हथियार का इस्तेमाल अमेरिकी सेना,अमेरिकी मरीन कॉर्प्स और कई दूसरे देशों की सेनाएं भी करती हैं।