कोलकाता का चाइनीज काली मंदिर, जहां माता को प्रसाद में चढ़ाए जाते हैं नूडल्स!

Chinese Kali Mandir: भक्तों के लिए नूडल्स का प्रसाद सिर्फ एक अनोखी चीज नहीं है, बल्कि यह कृतज्ञता, अपनापन और समावेश का प्रतीक है। यह परंपरा बताती है कि सच्चे मन से किया गया अर्पण, चाहे वो किसी भी संस्कृति से जुड़ा हो, ईश्वर को स्वीकार्य होता है। आज भी टांगरा का चीनी काली मंदिर इस पुरानी परंपरा को निभा रहा है

अपडेटेड Jan 29, 2026 पर 2:43 PM
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कोलकाता को चाइनीज काली मंदिर, जहां माता को प्रसाद में चढ़ाए जाते हैं नूडल्स!

कोलकाता के ऐतिहासिक टांगरा इलाके में, जिसे अक्सर शहर का चाइनाटाउन कहा जाता है, चाइनीज काली मंदिर अपनी एक अनोखी परंपरा के लिए जाना जाता है। इस मंदिर में मां काली को प्रसाद के रूप में नूडल्स चढ़ाए जाते हैं। यह परंपरा कई भक्तों को चौंका देती है। आस्था और संस्कृति का यह अनोखा मेल इस मंदिर को खास बनाता है। टांगरा का काली मंदिर सिर्फ पूजा स्थल ही नहीं, बल्कि इस बात का जीता जागता उदाहरण है कि परंपराएं समय के साथ ढलते हुए भी अपनी मूल भावना को बरकरार रख सकती हैं।

टांगरा का चीनी काली मंदिर: शुरुआत कैसे हुई?

चाइनीज काली मंदिर की शुरुआत करीब 80 साल पहले मानी जाती है। कहा जाता है कि एक चाइनीज परिवार का छोटा बच्चा गंभीर रूप से बीमार पड़ गया था और डॉक्टरों ने भी उम्मीद छोड़ दी थी। तब उसके परिवार वाले उसे उस जगह पर लेकर आए, जहां आज यह मंदिर स्थित है। उस समय वहां एक पेड़ के नीचे दो काले पत्थर थे, जिन्हें स्थानीय लोग मां काली का रूप मानकर पूजा करते थे।


कई दिनों तक सच्चे मन से पूजा करने के बाद बच्चा ठीक हो गया। इसके बाद कृतज्ञता के रूप में उस परिवार ने मां काली की नियमित पूजा शुरू की। टांगरा में बसे चाइनीज समुदाय के सहयोग से बाद में वहां एक पक्का मंदिर बनाया गया। आज यह मंदिर हर समुदाय के लोगों के लिए आस्था का केंद्र बन चुका है और कोलकाता के प्रमुख धार्मिक स्थलों में गिना जाता है।

नूडल्स को प्रसाद क्यों चढ़ाया जाता है?

नूडल्स को प्रसाद के रूप में चढ़ाने की परंपरा चाइनीज समुदाय की संस्कृति से जुड़ी है। जब अलग-अलग दौर में अशांति और गृहयुद्ध के कारण चीनी परिवार कोलकाता आए, तो नूडल्स उनका मुख्य भोजन हुआ करता था। उन्होंने मां काली को वही अर्पित किया, जिसे वे जानते और मानते थे। उनका विश्वास था कि पूजा में वस्तु से ज्यादा भावना मायने रखती है।

समय के साथ नूडल्स, जिन्हें चाउमीन भी कहा जाता है, मंदिर का भोग बन गए और बाद में भक्तों को प्रसाद के रूप में बांटे जाने लगे। कभी-कभी यहां मोमोज भी प्रसाद के रूप में दिए जाते हैं, जो समुदाय की खानपान परंपरा को दर्शाते हैं।

आस्था और संस्कृति का संगम

चाइनीज काली मंदिर इस बात का प्रतीक है कि आस्था किसी एक संस्कृति या पहचान तक सीमित नहीं होती। दिलचस्प बात यह है कि वर्तमान में इस मंदिर की सेवा करने वाले भी चीनी समुदाय से है और वे खुद को चाइनीज हिंदू बताते हैं। यह दिखाता है कि टांगरा में मां काली की पूजा एक साझा आध्यात्मिक परंपरा बन चुकी है।

इस में मंदिर अलग-अलग पृष्ठभूमि के भक्त आते हैं, जो यहां न सिर्फ आशीर्वाद लेने आते हैं, बल्कि इस अनोखी परंपरा को देखने भी आते हैं।

प्रसाद से जुड़ा गहरा संदेश

भक्तों के लिए नूडल्स का प्रसाद सिर्फ एक अनोखी चीज नहीं है, बल्कि यह कृतज्ञता, अपनापन और समावेश का प्रतीक है। यह परंपरा बताती है कि सच्चे मन से किया गया अर्पण, चाहे वो किसी भी संस्कृति से जुड़ा हो, ईश्वर को स्वीकार्य होता है।

आज भी टांगरा का चीनी काली मंदिर इस पुरानी परंपरा को निभा रहा है। परंपरा और आधुनिकता के इस संतुलन के बीच यह मंदिर हमें याद दिलाता है कि आस्था करुणा, विश्वास और आपसी सद्भाव से ही मजबूत होती है।

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