विरोध के बाद लोकपाल ने रद्द किया ₹5 करोड़ की 7 BMW कार खरीदने का टेंडर

अब रद्द हो चुकी खरीद योजना 16 अक्टूबर 2025 को जारी की गई थी। इसमें नामी कंपनियों से सात BMW 3 सीरीज 330Li गाड़ियों की सप्लाई के लिए बोली मांगी गई थी। ये कारें लोकपाल के चेयरपर्सन और छह सदस्‍यों को अलग-अलग दी जानी थीं। लोकपाल की अगुवाई पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस एएम खानविलकर कर रहे हैं

अपडेटेड Jan 01, 2026 पर 2:53 PM
विरोध के बाद लोकपाल ने रद्द किया ₹5 करोड़ की 7 BMW कार खरीदने का टेंडर

लोकपाल ने सात लग्जरी BMW कारों की खरीद के लिए अपने टेंडर को वापस ले लिया है, जिसकी पिछले दिनों काफी चर्चा थी। इस टेंडर को करीब दो महीने पहले जारी किया गया था, लेकिन विपक्षी दलों और नागरिक समाज की लगातार आलोचनाओं के बाद इसे वापस ले लिया गया। अधिकारियों ने गुरुवार को पुष्टि की है कि भ्रष्टाचार विरोधी लोकपाल की पूरी बेंच ने एक प्रस्ताव पारित करने के बाद टेंडर रद्द करने का फैसला लिया गया था। इसके बाद 16 दिसंबर 2025 को औपचारिक संशोधन (कॉरिजेंडम) जारी किया गया। यह जानकारी न्यूज एजेंसी PTI ने दी है।

अब रद्द हो चुकी खरीद योजना 16 अक्टूबर 2025 को जारी की गई थी। इसमें नामी कंपनियों से सात BMW 3 सीरीज 330Li गाड़ियों की सप्लाई के लिए बोली मांगी गई थी। ये कारें लोकपाल के चेयरपर्सन और छह सदस्‍यों को अलग-अलग दी जानी थीं।

लोकपाल की अगुवाई पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस एएम खानविलकर कर रहे हैं। इस संस्था में चेयरपर्सन के अलावा अधिकतम आठ सदस्‍य हो सकते हैं- चार न्यायिक और चार गैर-न्यायिक।


टेंडर के अनुसार, लोकपाल ने हाई क्लास BMW 330Li "M Sport" वैरिएंट वाली गाड़ियां मांगी थीं। ये लंबे व्हीलबेस वाली और सफेद रंग की होनी थीं।

दिल्ली में इन सात गाड़ियों की कुल ऑन-रोड कीमत करीब 5 करोड़ रुपए बताई गई थी। यह आंकड़ा सामने आते ही विवाद खड़ा हो गया।

विपक्षी दल खासे नाराज हुए। उन्होंने भ्रष्टाचार विरोधी संस्था के लग्जरी गाड़ियां खरीदने पर सवाल उठाए। कई नेताओं ने कहा कि जनता के पैसे से ऐसी फिजूलखर्ची गलत संदेश देती है, जब संस्थाओं को सादगी और पारदर्शिता दिखानी चाहिए।

कांग्रेस के संचार विभाग के महासचिव जयराम रमेश ने तो इसे "शौकपाल" कहकर कटाक्ष किया। उन्होंने आरोप लगाया कि यह संस्था जनता की नजरों में अपनी साख से ज्यादा लग्जरी को अहमियत दे रही है।

यह आलोचना सिर्फ राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं रही। सिविल सोसाइटी के कार्यकर्ता और पूर्व वरिष्ठ नौकरशाहों ने भी अपनी राय रखी।

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