पीएम मोदी ने 'शौर्य यात्रा' का किया नेतृत्व, 1000 साल के संघर्ष और विजय के उत्सव के रूप में मनाया जा रहा सोमनाथ स्वाभिमान पर्व

Somnath Swabhiman Parv: अरब सागर के तट पर स्थित सोमनाथ मंदिर 12 आदि ज्योतिर्लिंगों में प्रथम माना जाता है। बार-बार विनाश और फिर से निर्माण की अपनी कहानी के साथ, यह मंदिर भारत की अजेय आस्था का प्रतीक है। 150 फीट ऊंचा इसका शिखर आज भी विश्व को भारत की सांस्कृतिक दृढ़ता का संदेश देता है

अपडेटेड Jan 11, 2026 पर 12:40 PM
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यह यात्रा उन योद्धाओं के सम्मान में निकाली गई जिन्होंने सदियों तक सोमनाथ मंदिर की रक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए

Somnath Swabhiman Parv: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने गुजरात दौरे के दूसरे दिन आज सोमनाथ में आयोजित 'शौर्य यात्रा' में शामिल हुए। यह आयोजन 'सोमनाथ स्वाभिमान पर्व' का हिस्सा है, जो मंदिर के गौरवशाली इतिहास और सांस्कृतिक पुनरुत्थान का प्रतीक है। पीएम मोदी सुबह करीब 9:45 बजे शौर्य यात्रा में शामिल हुए और उसके बाद भगवान सोमनाथ की विशेष पूजा-अर्चना की।

वीरता और बलिदान को नमन


यह यात्रा उन योद्धाओं के सम्मान में निकाली गई जिन्होंने सदियों तक सोमनाथ मंदिर की रक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। इस जुलूस में 108 घोड़े शामिल होते है, जो साहस और बलिदान का प्रतिनिधित्व करते हैं। गुजरात के विभिन्न संस्कृत संस्थानों के छात्र मंत्रोच्चार, शंखनाद और डमरू वादन के साथ यात्रा का स्वागत करेंगे। खेड़ा और भरूच के वेद पाठशालाओं से आए सैकड़ों छात्र इस भव्य आयोजन का हिस्सा बन रहे हैं। प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया पर मंदिर को 'शाश्वत दिव्यता का प्रकाश स्तंभ' बताया, जो पीढ़ियों का मार्गदर्शन करता आ रहा है।

1026 से 2026 तक का सफर

'सोमनाथ स्वाभिमान पर्व' 8 से 11 जनवरी का ऐतिहासिक महत्व अत्यंत गहरा है। यह पर्व महमूद गजनवी द्वारा 1026 ईस्वी में सोमनाथ मंदिर पर किए गए पहले हमले की 1000वीं बरसी के रूप में मनाया जा रहा है। इस वर्ष वर्तमान मंदिर के प्राण-प्रतिष्ठा (11 मई 1951) के 75 साल भी पूरे हो रहे है। नवंबर 1947 में सरदार वल्लभभाई पटेल ने सोमनाथ के खंडहरों को देखकर इसे फिर से बनाने का संकल्प लिया था, जिसे भारत के सांस्कृतिक आत्मविश्वास की बहाली माना गया।

अरब सागर के तट पर स्थित सोमनाथ मंदिर 12 आदि ज्योतिर्लिंगों में प्रथम माना जाता है। बार-बार विनाश और फिर से निर्माण की अपनी कहानी के साथ, यह मंदिर भारत की अजेय आस्था का प्रतीक है। 150 फीट ऊंचा इसका शिखर आज भी विश्व को भारत की सांस्कृतिक दृढ़ता का संदेश देता है।

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