'मजिस्ट्रेट की ऐसी हिम्मत कैसे हुई?'; CJP प्रदर्शनकारी छात्र को नोटिस भेजने पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, ग्रेटर नोएडा प्रशासन को फटकारा
CJP protester: राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के 36 दिन लंबे आंदोलन में शामिल एक छात्र को नोटिस जारी किए जाने पर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (9 सितंबर) को गौतम बुद्ध नगर (ग्रेटर नोएडा) प्रशासन को कड़ी फटकार लगाई। अदालत ने सवाल उठाया कि कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने प्रदर्शनकारी छात्र को नोटिस कैसे जारी कर दिया?
CJP प्रदर्शनकारी छात्र को नोटिस भेजने पर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद ही सख्त टिप्पणी की है
Noida DM notice to CJP protester: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (9 सितंबर) को दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) की अगुवाई में हुए प्रदर्शन में शामिल होने को लेकर एक छात्र को नोटिस जारी करने पर ग्रेटर नोएडा की कार्यकारी मजिस्ट्रेट को कड़ी फटकार लगाई। शीर्ष अदालत ने पूछा कि उसके पहले के आदेश के बावजूद मजिस्ट्रेट ने ऐसा नोटिस जारी करने की हिम्मत कैसे की। शीर्ष न्यायालय ने कहा कि वह इस मामले में ग्रेटर नोएडा की कार्यकारी मजिस्ट्रेट से स्पष्टीकरण मांगेगा।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान पूछा कि कार्यकारी मजिस्ट्रेट ऐसा नोटिस कैसे जारी कर सकती हैं। जबकि शीर्ष अदालत पहले ही निर्देश दे चुकी है कि छात्रों के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी।
नोटिस बाद में वापस ले लिया गया
वरिष्ठ वकील विश्वजीत भट्टाचार्य ने सीजेआई की अगुवाई वाली तीन सदस्यीय पीठ के समक्ष इस मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत के छात्रों पर प्रयोग किया जा रहा है। वकील ने कहा कि यह नोटिस भी सुप्रीम कोर्ट के 1 सितंबर के आदेश के विपरीत था। हालांकि, नोटिस बाद में वापस ले लिया गया।
उन्होंने कहा कि प्रथम दृष्टया अधिकारी अदालत की अवमानना के दोषी हैं। बाद में नोटिस वापस ले लेने से उन्हें अवमानना की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं किया जा सकता। इस पर सीजेआई ने कहा, "आप बिल्कुल सही कह रहे हैं। हमारे युवाओं के खिलाफ कार्रवाई करने का कोई सवाल ही नहीं है। हमने स्पष्ट आदेश पारित किया है।"
'मजिस्ट्रेट नोटिस कैसे जारी कर सकती हैं?'
चीफ जस्टिस ने आगे कहा, "हमें हैरानी है कि मजिस्ट्रेट नोटिस कैसे जारी कर सकती हैं, जबकि हमने पहले ही किसी भी छात्र के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई नहीं करने का आदेश दिया है। यह बिल्कुल स्पष्ट आदेश था।"
CJI ने वरिष्ठ वकील से मामले के तथ्यों को रिकॉर्ड पर रखने को कहा। उन्होंने कहा, "हम स्पष्टीकरण मांगेंगे। वह बताएं कि ऐसा क्यों किया गया।" पीठ में CJI के अलावा जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल थे।
GBU के स्टूडेंट को भेजा गया था नोटिस
अधिकारियों ने मंगलवार को बताया था कि गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय (GBU) के एक छात्र को दिल्ली के जंतर-मंतर पर CJP की अगुवाई में हुए प्रदर्शन में कथित तौर पर शामिल होने के मामले में ग्रेटर नोएडा की कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने नोटिस जारी किया था। नोटिस में शांति बनाए रखने के लिए छात्र से पांच लाख रुपये का निजी मुचलका भरने को कहा गया था। हालांकि, बाद में यह आदेश वापस ले लिया गया।
हालांकि, छात्र अक्षत त्रिपाठी ने आरोपों से इनकार किया। उन्होंने कहा कि उसने प्रदर्शन में शांतिपूर्वक हिस्सा लिया था। उस समय वह विश्वविद्यालय की क्लासेस नहीं ले रहा था। यह नोटिस चार सितंबर को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 130 के तहत जारी किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने रद्द किए सभी FIR
सुप्रीम कोर्ट ने 1 सितंबर को उन सभी FIR को रद्द कर दिया था, जो देश भर में 20 से 25 जुलाई के बीच CJP के नेतृत्व में हुए विरोध प्रदर्शनों में शामिल छात्रों के खिलाफ दर्ज की गई थीं। CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने केंद्र सरकार को यह भी निर्देश दिया था कि नीट पेपर लीक के कारण अपनी जान गंवाने वाले छात्रों के परिवारों को तीन महीने के भीतर मुआवजा दिया जाए।
प्रदर्शनकारियों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही बंद करने के केंद्र के अनुरोध पर पीठ ने कहा था, "युवा प्रदर्शनकारियों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए, हम पूरा न्याय करने के लिए संविधान के आर्टिकल 142 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हैं।"
दिल्ली के जंतर-मंतर पर 20 जुलाई को कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) की अगुवाई में निकाले गए मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच झड़पें हुई थीं। संसद की ओर बढ़ने की कोशिश कर रही भीड़ को तितर-बितर करने के लिए सुरक्षाकर्मियों ने लाठियां चलाई थीं। इस दौरान पुलिस ने आंसू गैस के गोले भी छोड़े थे।