Economist Surjit Bhalla: क्या भारत की तरक्की और बड़े आर्थिक सुधारों के आड़े यहां की नौकरशाही आ रही है? क्या भारत में भी कोई 'डीप स्टेट' काम कर रहा है जो पर्दे के पीछे से देश की नीतियां तय करता है? प्रख्यात अर्थशास्त्री और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के पूर्व कार्यकारी निदेशक सुरजीत भल्ला ने भारत की प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर एक बेहद चौंकाने वाला दावा किया है।
मनीकंट्रोल की श्वेता पुंज को दिए एक विशेष इंटरव्यू में सुरजीत भल्ला ने देश के नीतिगत फैसलों में वरिष्ठ नौकरशाहों के अत्यधिक प्रभाव को 'डीप स्टेट' करार दिया है। उन्होंने साफ कहा कि भारत में वास्तविक और बड़े आर्थिक सुधार तभी हुए हैं, जब कमान आईएएस अधिकारियों के हाथ में नहीं थी। आइए समझते हैं सुरजीत भल्ला के इस बड़े दावे के पीछे की पूरी कहानी।
1991 के सुधार: जब IAS अधिकारियों के हाथ में नहीं थी कमान
श्वेता पुंज के साथ बातचीत में सुरजीत भल्ला ने भारत के आर्थिक इतिहास का एक बेहद दिलचस्प उदाहरण सामने रखा। भल्ला ने कहा कि 1960 और 1970 के दशक से भारत एक ही ढर्रे पर चल रहा था। देश को आर्थिक संकट से बाहर निकालने वाले 1991 के ऐतिहासिक सुधार इकलौता ऐसा समय था, जब देश का 'डीप स्टेट' बेअसर साबित हुआ था।
उन्होंने तर्क दिया कि 1991 की वो नीतियां मोंटेक सिंह अहलूवालिया के नेतृत्व में तैयार की गई थीं, जो कि खुद एक आईएएस अधिकारी नहीं थे। सुरजीत भल्ला के मुताबिक, यह कोई संयोग नहीं है कि भारत में सबसे बड़े सुधार उसी दौर में हुए जब जहाज का रुख तय करने वाला कोई वरिष्ठ बाबू नहीं था।
सुरजीत भल्ला ने किसे बताया भारत का 'डीप स्टेट'?
जब श्वेता पुंज ने उनसे 'ब्यूरोक्रेसी पैरालिसिस' यानी नौकरशाही के कारण कामकाज ठप होना और 'डीप स्टेट' का सटीक मतलब पूछा, तो भल्ला ने इसकी परतें खोलीं:
सुरजीत भल्ला के अनुसार, 'डीप स्टेट' का मतलब एक ऐसी व्यवस्था या उन चुनिंदा व्यक्तियों से है, जो पर्दे के पीछे रहकर देश के सबसे बड़े फैसले लेते हैं, लेकिन उनकी जनता या किसी के प्रति कोई जवाबदेही नहीं होती।
आलोचकों के इस तर्क पर कि सारे फैसले प्रधानमंत्री लेते हैं, भल्ला ने कहा कि कोई भी प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति हर विषय का विशेषज्ञ नहीं हो सकता। उन्हें इनपुट और सुझाव देने का काम सलाहकारों की एक टीम करती है। भारत में यह काम पूरी तरह नौकरशाही के इर्द-गिर्द सिमटा है, जो प्रधानमंत्री को सुझाव देती है कि 'आपको यह फैसला लेना चाहिए।'
आर्थिक तरक्की के लिए US के साथ ट्रेड डील जरूरी
इंटरव्यू के दौरान सुरजीत भल्ला ने भारत की भविष्य की ग्रोथ और मिडिल ईस्ट के मौजूदा हालातों पर भी बात की। उनका मानना है कि भले ही भारत ने मिडिल ईस्ट के तूफानों को झेल लिया हो, लेकिन देश की जीडीपी ग्रोथ को असली रफ्तार अमेरिका के साथ एक बड़े व्यापार समझौते से मिल सकती है।
अमेरिका के साथ ट्रेड डील होने से भारतीय रुपया मजबूत होगा, विदेशी संस्थागत निवेशक (FIIs) भारत लौटेंगे और देश का प्राइवेट सेक्टर भी खुलकर निवेश करना शुरू करेगा।
वहीं उन्होंने कहा कि भारत ने यूरोपीय संघ और ब्रिटेन (UK) के साथ व्यापार समझौते किए हैं, लेकिन उनमें निवेश को लेकर कोई ठोस प्रावधान नहीं हैं। इसके अलावा, यूरोपीय संघ की अर्थव्यवस्था दुनिया की सबसे ज्यादा रेगुलेटेड और प्रतिबंधात्मक अर्थव्यवस्थाओं में से एक है।