Monsoon Heat Explainer: मॉनसून आ गया फिर भी क्यों तप रहे दिल्ली NCR समेत देश के बड़े शहर?

भीषण और झुलसाने वाली गर्मी के बीच मानसून का आना हमेशा एक बड़ी राहत लेकर आता है। लेकिन दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद और हैदराबाद जैसे भारत के शहरों में रहने वाले लाखों लोगों के लिए इस बार की बारिश मौसम को ठंडा महसूस नहीं करा रही है।

अपडेटेड Jul 06, 2026 पर 1:45 PM
बारिश के बाद भी क्यों नहीं मिल रही गर्मी से राहत?

भीषण और झुलसाने वाली गर्मी के बीच मानसून का आना हमेशा एक बड़ी राहत लेकर आता है। लेकिन दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद और हैदराबाद जैसे भारत के शहरों में रहने वाले लाखों लोगों के लिए इस बार की बारिश मौसम को ठंडा महसूस नहीं करा रही है। इसके बजाय लोग बेहद चिपचिपी और असुविधाजनक स्थिति का सामना कर रहे हैं। ये गर्मी शरीर को और भी अधिक थका देने वाली महसूस हो रही है। आइए डिकोड करते हैं कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है और इस नए हीट इफेक्ट के पीछे की वजहें क्या हैं?

क्या है हीट इंडेक्स जो मानसून में भी बढ़ा रहा है तपिश?

मानसून आने के बावजूद गर्मी महसूस होने की प्राइमरी वजह हीट इंडेक्स है लेकिन अब इसमें और भी कई चीजें जुड़ गई हैं। हीट इंडेक्स मूल रूप से फील्स लाइक टेंप्रेचर है। यानी वह तापमान जिसे हमारा शरीर असल में महसूस करता है। भले ही बारिश होने से हवा का तापमान कम हो जाता है लेकिन यह हवा में नमी की मात्रा को बढ़ा देती है। हवा में उच्च आर्द्रता यानी हाई ह्यूमेडिटी की वजह से त्वचा से पसीना आसानी से वाष्पित नहीं हो पाता। इससे शरीर का प्राकृतिक कूलिंग सिस्टम धीमा पड़ जाता है। नतीजतन लोगों को मौसम ऐप पर दिखने वाले असल टेंप्रेचर से कहीं अधिक गर्मी महसूस होती है।


सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की एक पॉलिसी ब्रीफ के मुताबिक हाल के वर्षों में जुलाई और अगस्त के दौरान दिल्ली का हीट इंडेक्स नियमित रूप से 46 से 50 डिग्री सेल्सियस को पार कर गया है, भले ही उस समय रियल टेंप्रेचर काफी कम था। इस वजह से लोगों की असुविधा बहुत बढ़ गई है और बिजली की खपत में भी भारी इजाफा हुआ है।

उमस भरी गर्मी, एक नया खतरा

हीट इंडेक्स को बढ़ाने वाली यह उमस अब पिछले वर्षों की तुलना में कहीं अधिक आम होती जा रही है। अमेरिका के क्लाइमेट सेंट्रल की एक स्टडी के मुताबिक भारत में 1970 के दशक के बाद से खतरनाक रूप से उमस भरे गर्मी के दिनों की संख्या में भारी बढ़ोतरी देखी गई है। दिल्ली, गाजियाबाद, अहमदाबाद, जयपुर, नागपुर और रायपुर जैसे शहरों में ऐसे दिनों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि गर्म होते समुद्र, विशेष रूप से अरब सागर और बंगाल की खाड़ी, मैदानी इलाकों की तरफ अधिक नमी लेकर आ रहे हैं। इसके साथ ही तेजी से हो रहा शहरीकरण और कंक्रीट से भरे शहर इस गर्मी को अपने अंदर कैद कर लेते हैं। इससे स्थिति और भी बदतर हो जाती है।

रातें भी नहीं दे रहीं राहत, हीट वेव का प्रकोप

बढ़ती उमस के साथ जो एक सबसे बड़ा बदलाव आया है वह है गर्म रातों का बढ़ना। इस साल मार्च में फिजिक्स एंड केमिस्ट्री ऑफ द अर्थ जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि दिल्ली, आगरा, कानपुर, कोच्चि और वाराणसी सहित भारत के कई स्मार्ट शहर रात के समय लगातार चलने वाली हीट वेव का सामना कर रहे हैं। हवा में मौजूद उच्च आर्द्रता सूर्यास्त के बाद इमारतों और सड़कों को ठंडा होने से रोकती है। इससे रात भर तापमान बढ़ा रहता है। सीएसजेएम यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर और इस स्टडी के को-राइटर काशिफ इमदाद के मुताबिक अधिकतर शहरों के हीट एक्शन प्लान अभी भी मुख्य रूप से दिन की गर्मी पर ध्यान केंद्रित करते हैं और गर्म रातों से पैदा होने वाले बढ़ते खतरों की अनदेखी कर रहे हैं।

क्या सिर्फ कूल रूफ और पेड़ लगाना ही काफी है?

एक्सपर्ट्स का कहना है कि गर्मी को कम करने के लिए सिर्फ कूल रूफ डिजाइन करना और वृक्षारोपण अभियान चलाना ही पर्याप्त नहीं है। सेप्ट यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर राजन रावल के मुताबिक इनडोर आराम सिर्फ छत के तापमान पर ही निर्भर नहीं करता बल्कि यह उमस, हवा के प्रवाह और इमारतों को बनाने में इस्तेमाल होने वाली सामग्री पर भी निर्भर करता है क्योंकि शहरी गर्मी केवल दिन के समय धूप के संपर्क में आने तक सीमित नहीं है। इसी तरह अधिक पेड़ लगाने से अपने आप हीट स्ट्रेस कम नहीं होता। असल में जिन शहरों में उमस ज्यादा होती है वहां बिना उचित वेंटिलेशन या एयरफ्लो के घने पेड़ नमी को रोक लेते हैं। इससे राहत मिलने के बजाय असुविधा और अधिक बढ़ जाती है।

भारतीय शहरों को अब क्या करने की जरूरत है?

आमतौर पर सैटेलाइट डेटा से मिलने वाला शहरों का हीट मैप सिर्फ दिन के समय भूमि की सतह के तापमान पर ध्यान केंद्रित करता है और रात के समय के अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट, हवा के तापमान और उमस को नजरअंदाज कर देता है। इसलिए विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय शहरों को मौसमी आपातकालीन उपायों के बजाय दीर्घकालिक योजना की आवश्यकता है।

विशेषज्ञों के सुझाव और शहरों के कदम

शहरों को ऐसी इमारतों को डिजाइन करने पर ध्यान देना चाहिए जो प्राकृतिक रूप से ठंडी रहें, वेंटिलेशन में सुधार करें, बेहतर वायु प्रवाह के साथ हरित क्षेत्रों को बढ़ाएं, बिजली की विश्वसनीय पहुंच का विस्तार करें और अस्पतालों को दिन व रात दोनों समय की गर्मी से निपटने के लिए तैयार करें।

कटक और संबलपुर जैसे कुछ शहरों ने पहले ही इस दिशा में कदम बढ़ाना शुरू कर दिया है। ठाणे ने एक अधिक विस्तृत हीट एक्शन प्लान तैयार किया है। इसमें उमस और गर्म रातों के फैक्टर को भी शामिल किया गया है। भुवनेश्वर एक डिजिटल क्लाइमेट-रिस्क डैशबोर्ड तैयार कर रहा है, जो भविष्य की योजना बनाने में अधिकारियों की मदद करने के लिए बिल्डिंग स्तर पर हीट स्ट्रेस का नक्शा तैयार करेगा।

जैसे-जैसे जलवायु परिवर्तन मौसम के मिजाज को बदल रहा है विशेषज्ञों का कहना है कि तापमान पर नजर रखने के साथ-साथ उमस और हीट इंडेक्स को समझना भी उतना ही महत्वपूर्ण हो जाएगा। शहरी भारत के लिए चुनौती अब सिर्फ दिन की गर्मी ही नहीं है बल्कि वार्म नाइट से निपटने की भी है।

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