अब आपको घर बैठे सिर्फ यूरिन सैंपल देकर किसी गंभीर बीमारी के टेस्ट का पता चलने वाला है, ब्लैडर कैंसर की स्क्रीनिंग को लेकर ब्रिटेन में इसी तरह की एक नई उम्मीद सामने आई है। इस बीमारी की आशंका होने पर पेशेंट को हॉस्पिटल जाकर कई तरह के टेस्ट करने पड़ सकते है। इसी परेशानी को कम करने के लिए अब ऐसी टेस्टिंग पर काम किया जा रहा है, जिसे पेशेंट घर से ही कर सके। इस नई टेक्निक ने डॉक्टरों और रिसर्चर्स का ध्यान इसलिए खींचा है, क्योंकि यदि यह आगे भी सफल रहती है तो कैंसर के टेस्ट का तरीका पहले से काफी आसान हो सकता है।
हॉस्पिटल की लाइन की टेंशन खत्म
बड़े लेवल पर कैंसर टेस्टिंग
एनएचएस के टेस्ट में गैलीज यूरिन टेस्ट ने ब्लैडर कैंसर के करीब 92 प्रतिशत मामलों की पहचान की। वहीं, जिन पेशेंट का टेस्ट निगेटिव आया, उनमें 99 परसेंट से ज्यादा संभावना थी कि उन्हें ब्लैडर कैंसर नहीं है। लेकिन इन नतीजों को बड़े लेवल पर होने वाली आगे की रिसर्च में भी चेक करना जरूरी है।
यूके की फंडिंग से कैंसर रिसर्च
यह टेस्ट यूरिन में मौजूद उस जेनेटिक मटीरियल की टेस्टिंग करता है, जिसे ब्लैडर कैंसर छोड़ सकता है। इसमें 23 जीन से जुड़े 450 से ज्यादा डीएनए म्यूटेशन की जांच की जाती है। इस टेक्निक को यूनिवर्सिटी ऑफ बर्मिंगम ने कैंसर रिसर्च यूके की फंडिंग से डेवलप किया था।
टाइम पर टेस्टिंग क्यों है जरूरी
ब्लैडर कैंसर 60 साल से ज्यादा उम्र के पुरुषों में ज्यादा देखा जाता है। यूरिन में खून आना इसका सिम्प्टम माना जाता है। बीमारी कितनी गंभीर है, यह इस बात पर डिपेंड करता है कि कैंसर कितना बढ़ चुका है और शरीर के दूसरे हिस्सों तक फैला है या नहीं। इसलिए किसी भी सिम्प्टम को नजरअंदाज करने के बजाय समय पर डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।
स्टडी से जुड़े रिसर्चर्स ने टेस्ट के शुरुआती नतीजों को काफी उम्मीद भरा बताया है। करीब 1,000 पेशेंट पर हुए ट्रायल में इसके परफॉरमेंस को देखने के बाद साइंटिस्ट को उम्मीद है कि आगे की रिसर्च से इसकी उपयोगिता को और बेहतर तरीके से समझा जा सकेगा। ऐसे में डाइगोस्टिक प्रोसेस जितनी आसान और कम परेशानी वाली होगी, लोगों के लिए समय पर कदम उठाना उतना ही सहज होगा। इस नई टेक्निक से सभी में एक नई उम्मीद जगी हैं। लेकिन किसी भी नए तरीके को आम इस्तेमाल में लाने से पहले उसकी सही टेस्टिंग और सेफ्टी को अच्छी तरह परखना जरूरी होता है।