बच्चों के साथ रेस्टोरेंट, शॉपिंग मॉल या किसी पब्लिक प्लेस पर जाना कई बार माता-पिता के लिए चुनौती बन जाता है। बच्चा अचानक रोने लगे, जोर-जोर से चिल्लाने लगे या अपनी बात मनवाने के लिए जिद करने लगे, तो उस समय माता-पिता को समझ नहीं आता कि उसे कैसे शांत किया जाए। ऊपर से आसपास के लोगों का देखना और भी परेशान कर देता हैं।
ऐसे समय में बच्चे को तुरंत डांटने या सजा देने के बजाय थोड़ा धैर्य रखना ज्यादा मददगार हो सकता है। जेंटल पेरेंटिंग इसी तरह बच्चों के व्यवहार को समझने और उन्हें धीरे-धीरे सही तरीका सिखाने पर जोर देती है। लेकिन पब्लिक प्लेस पर बच्चे के टैंट्रम को संभालने के लिए आखिर किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? एक मॉमी इन्फ्लुएंसर ने अपने एक्सपीरियंस से कुछ आसान तरीके बताए हैं, जो आपके भी काम आ सकते हैं।
बच्चे के साथ लंबे समय के लिए बाहर जा रहे हैं, तो उसके पसंदीदा छोटे स्नैक्स साथ रखना काम आ सकता है। कई बार भूख या खाने में देरी होने पर बच्चा चिड़चिड़ा होकर रोने या जिद करने लगता है। रेस्टोरेंट में खाना आने तक स्नैक उसे कुछ देर बिजी रख सकता है। ऑटम भी अपने बेटे के लिए ऐसे स्नैक्स साथ रखती हैं, ताकि जरूरत पड़ने पर बच्चे को संभालना आसान हो।
बच्चे का पसंदीदा खिलौना या किताब साथ रखने से वह अनजान जगह पर भी आराम से रह सकता है। यदि लंबे समय तक रेस्टोरेंट में बैठना हो, तो कोई छोटा नया खिलौना भी रखा जा सकता है, जिससे बच्चे की दिलचस्पी बनी रहे। ऑटम के मुताबिक, उनका बेटा अब खुद अपना बैकपैक लेकर उसमें रेस्टोरेंट में खेलने के लिए खिलौने रखता है। कभी वह जरूरत से ज्यादा सामान भी रख लेता है, लेकिन जब तक खिलौनों से आसपास किसी को परेशानी नहीं होती, उसे अपनी पसंद की चीजें चुनने की आजादी दी जाती है।
हर बार बच्चा बाहर जाकर परेशान हो तो उसे फोन या आईपैड देना सही आदत नहीं बनानी चाहिए। ऑटम बताती हैं कि उन्होंने रेस्टोरेंट में आईपैड देने से हमेशा बचने की कोशिश की, ताकि बच्चे को यह उम्मीद न हो कि बाहर जाते ही उसे स्क्रीन मिलेगी। लेकिन बच्चा बहुत ज्यादा थका हुआ हो या किसी दिन बिल्कुल शांत न हो रहा हो, तो कभी-कभार फोन या आईपैड का सहारा लेना भी हो सकता है। जरूरी यह है कि इसे रोज की आदत न बनाया जाए और बच्चे को धीरे-धीरे पब्लिक प्लेस पर सही बिहेव करना सिखाया जाए।
कभी-कभी माता-पिता की पूरी कोशिश के बाद भी बच्चा शांत नहीं होता। ऑटम ने बताया कि उनके साथ भी करीब तीन बार ऐसी स्थिति आई, जब उनका बेटा बहुत थका हुआ था, टैंट्रम कर रहा था या उसका दिन खराब चल रहा था और उन्हें रेस्टोरेंट छोड़ना पड़ा। ऐसी स्थिति को लेकर परेशान होने या खुद को दोष देने की जरूरत नहीं है। बच्चे का हर दिन एक जैसा नहीं होता और कभी-कभी माहौल बदलने के लिए उसे बाहर ले जाना ही बेहतर विकल्प हो सकता है।
रेस्टोरेंट में बच्चे को सिर्फ चुप बैठाने के बजाय उससे बातचीत करना भी काफी मददगार हो सकता है। उससे खाने, आसपास की चीजों या दिनभर की किसी बात के बारे में बात करें और उसे बातचीत का हिस्सा बनाएं। इससे बच्चा बिजी रहता है और धीरे-धीरे समझता है कि बाहर किसी के साथ खाना खाने आए हैं, तो साथ बैठना और बातें करना भी जरूरी है। इस तरह उसका ध्यान लगातार फोन या आईपैड पर लगाने के बजाय परिवार और आसपास के लोगों पर रहता है।
पब्लिक प्लेस पर बच्चे का कभी-कभी रोना, जिद करना या टैंट्रम करना सामान्य बात है। हर सिचुएशन को तुरंत कंट्रोल करने की कोशिश करने के बजाय बच्चे की जरूरत समझना, पहले से थोड़ी तैयारी रखना और प्यार के साथ सीमाएं तय करना ज्यादा काम आ सकता है। जेंटल पेरेंटिंग का असली मकसद बच्चे को हर बात की छूट देना नहीं, बल्कि उसे धीरे-धीरे अपनी फीलिंग और बिहेवियर को संभालना सिखाना है।