जिंदगी में डर लगना आम बात है। हर किसी को कभी न कभी किसी चीज को खोने, असफल होने या लोगों की बातों का डर है। कई बार यही डर इतना बढ़ जाता है कि हम अपनी पसंद का काम नहीं करना चाहते। कोई नौकरी छोड़ने से डरता है, कोई अपनी बात कहने से, तो कोई नया कदम उठाने से क्योंकि उसे लगता है कि सब कुछ उम्मीद के मुताबिक नहीं हुआ तो क्या होगा। इस तरह डर धीरे-धीरे हमारे फैसलों पर असर डालने लगता है और हम कई मौके सिर्फ इसलिए छोड़ देते हैं क्योंकि हमें आगे का नतीजा साफ दिखाई नहीं देता।
भगवद्गीता की कर्मयोग की सीख हमें एक आसान और जरूरी बात समझाती है। हर चीज का नतीजा हमारे हाथ में नहीं होता, लेकिन अपनी तरफ से सही काम करना हमारे हाथ में जरूर है। इसलिए बार-बार यह सोचने के बजाय कि आगे क्या होगा, हमें अपने आज के काम पर ध्यान देना चाहिए। जब इंसान नतीजे की चिंता थोड़ी कम करके अपने कर्म पर भरोसा करता है, तो मन का डर धीरे-धीरे कम होने लगता है।
डर हमें सावधान रहने के लिए कहता है, लेकिन जब यही डर हर फैसले को रोकने लगे, तब यह परेशानी बन जाता है। कई बार हम सोचते रहते हैं कि कुछ गलत हो गया तो क्या होगा, लोग क्या कहेंगे या कहीं नुकसान न हो जाए। इसी वजह से कोई स्टूडेंट परीक्षा देने से पीछे हट सकता है, कोई नौकरी में अपने हक की बात नहीं रख पाता या कोई बिजनेस शुरू करने का अपना आइडिया टालता रहता है। इसलिए किसी भी फैसले से पहले खुद से पूछें कि जो डर लग रहा है, वह सच में किसी खतरे की वजह से है या सिर्फ मन की चिंता है।
2. नतीजे की चिंता छोड़ कर्म पर ध्यान दें
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण की सीख हमें बताती है कि हर समय नतीजे के बारे में सोचते रहने से मन परेशान हो सकता है। इसका मतलब यह नहीं है कि बिना सोचे-समझे कोई कदम उठा लिया जाए। पहले पूरी जानकारी लें, अपनी जिम्मेदारी समझें और जरूरी चीजों की जांच करें। इसके बाद जो सही लगे, उस दिशा में कदम बढ़ाएं। डर बार-बार पूछता है, यदि मेरे साथ कुछ गलत हो गया तो वहीं समझदारी पूछती है, इस समय मेरे लिए सही काम क्या है यही सोच फैसले लेने का तरीका बदल सकती है।
कई बार हमें असफलता से ज्यादा अपनी चीजें खोने का डर होता है। किसी को पैसे जाने की चिंता होती है, किसी को सम्मान खोने की, तो किसी को लोगों की मंजूरी न मिलने का डर रहता है। जब हम सफलता, तारीफ या सुरक्षा से बहुत ज्यादा जुड़ जाते हैं, तो छोटा-सा बदलाव भी डराने लगता है। ऐसे में जरूरी है कि हम अपनी पूरी जिंदगी को इन चीजों के आधार पर तय न करें। हम अपनी मेहनत और अपने फैसलों को जरूर बेहतर बना सकते हैं।
हिम्मत का मतलब यह नहीं है कि इंसान को कभी डर ही न लगे। असली हिम्मत तब दिखाई देती है, जब डर होने के बावजूद हम सोच-समझकर सही कदम उठाते हैं। किसी मुश्किल फैसले से पहले थोड़ा रुकें, गहरी सांस लें और अपने मन को शांत करें। फिर खुद से कहें, मैं डर कर नहीं, बल्कि साफ सोच के साथ फैसला करूंगा। धीरे-धीरे यह आदत आत्मविश्वास बढ़ाती है और हमें अपने फैसलों पर भरोसा करना सिखाती है।
इसी तरह आप भी हर फैसले से पहले, यदि कुछ गलत हो गया तो सोचकर रुक जाते हैं, तो एक बार अपने नजरिए को बदलकर देखें। डर को पूरी तरह खत्म करना जरूरी नहीं है, बस उसे अपने फैसलों पर हावी न होने दें। पहले सही-गलत को समझें, जरूरी जानकारी लें और फिर अपने कर्म पर भरोसा करके आगे बढ़ें। कर्म पर ध्यान देने से मन में शांति, आत्मविश्वास और आगे बढ़ने का हौसला अपने आप आने लगता है।