अखाड़ों के भीतर अपनी एक अलग दुनिया है। अनूठी परंपराएं, नियम-कायदे हैं। यहां की सुरक्षा व्यवस्था बेहद तगड़ी होती है। इस सुरक्षा की जिम्मेदारी भी साधु संत निभाते हैं। पुलिस की तरह यहां कोतवाल की पोस्ट होती है। जिसके पास सुरक्षा की अहम जिम्मेदारी होती है। मामूली गलती पर उसे सजा देने का भी अधिकार रहता है। हर एक अखाड़ा अपने नियम कानून से बंधे होते हैं। कुंभ और महाकुंभ में अखाड़ों का शिविर लगते ही कोतवाली बनाकर कोतवाल नियुक्ति किए जाते हैं। अखाड़े के भीतर आने-जाने वाले संतों और हर व्यक्ति पर कोतवाल की पैनी नजर रहती है। इनकी अनुमति के बिना कोई अखाड़े के शिविर में दाखिल नहीं हो सकता है।
कोतवाली अखाड़े के गुरु कुटिया के पास बनाई जाती है। जिसके आस-पास कोतवाल मौजूद रहते हैं। वहीं से पूरी छावनी की निगरानी की जाती है। कोतवाल अखाड़े की हर एक गतिविधियों पर नजर रखते हैं। कोतवाल के हाथ में चांदी की मुठिया लगी हुआ एक छड़ी (लाठी) होती है। ऐसे में कोतवाल को छड़ीदार भी कहा जाता है।
जानिए किसे कहते हैं अखाड़ा
अखाड़ा साधुओं का वो दल होता है, जो शस्त्र विद्या में निपुण होता है। वैसे आम भाषा में कुश्ती आदि के लिए ग्राउंड के लिए अखाड़ा शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। इससे साधुओं का अखाड़ा का संबंध भी इसी से है। कहा जाता है कि अलख शब्द से ही अखाड़ा शब्द निकला है। पहले अखाड़े शब्द का इस्तेमाल नहीं किया जाता था और इन्हें साधुओं का बेड़ा ही कहा जाता था। बताया जाता है कि मुगल काल में अखाड़ा शब्द का इस्तेमाल किया जाने लगा। जबकि धर्म के कुछ जानकारों का कहना ह कि साधुओं के अक्खड़ स्वभाव के चलते इसे अखाड़ा का नाम दिया गया है।
कुंभ में शामिल होने वाले सभी अखाड़े अपने अलग-नियम और कानून से चलते हैं। यहां जुर्म करने वाले साधुओं को अखाड़ा परिषद सजा देता है। छोटी चूक के दोषी साधु को अखाड़े के कोतवाल के साथ गंगा में पांच से लेकर 108 डुबकी लगाने के लिए भेजा जाता है। डुबकी के बाद वह भीगे कपड़े में ही देवस्थान पर आकर अपनी गलती के लिए क्षमा मांगता है। फिर पुजारी पूजा स्थल पर रखा प्रसाद देकर उसे दोषमुक्त करते हैं। विवाह, हत्या या दुष्कर्म जैसे मामलों में उसे अखाड़े से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। अखाड़े से निकल जाने के बाद ही इन पर भारतीय कानून के तहत कार्रवाई होती है।