दिनेश उन्नीकृष्णन

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने एक ऐसी पहल की है जिस पर कदम बढ़ाने में उनसे पहले के वित्त मंत्री लंबे वक्त तक बचते रहे थे। ये पहल है सरकारी बैंकों का निजीकरण करना। बजट भाषण में तो और सरकारी बैंकों में हिस्सेदारी कम करने की स्पष्ट योजना का ऐलान कर सीतारमण ने अपने मकसद को बिलकुल साफ कर दिया है।

इस बजट 2021 में बैंकिंग सेक्टर के लिए निश्चित तौर पर यही सबसे बड़ी चीज है। विनिवेश रणनीति का खुलासा करते हुए सीतारमण ने कहा है कि सरकार केवल रणनीतिक माने जाने वाले चार सेक्टरों को छोड़कर सभी इकाइयों का निजीकरण करेगी। वित्त मंत्री ने कहा है कि यहां तक कि इन सेक्टरों में भी सरकार अपना न्यूनतम मालिकाना हक रखेगी।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपनी बजट स्पीच में कहा है कि बैंकिंग सेक्टर में आईडीबीआई बैंक के अलावा सरकार दो और बैंकों और एक जनरल इंश्योरेंस कंपनी में अपनी हिस्सेदारी कम करेगी।

यह बयान कई मायनों में बेहद अहम है। पहला, इससे यह साबित होता है कि नरेंद्र मोदी सरकार बोल्ड रिफॉर्म्स के लिए प्रतिबद्ध है। दूसरा, अगर यह प्रयास सफलतापूर्वक लागू हो जाता है तो सरकार इस अहम सेक्टर में निजी सेक्टर की भागीदारी और बढ़ाएगी।

अगर अतीत को खंगाला जाए तो पता चलेगा कि बैंकों के निजीकरण का वादा एक के बाद एक कई सरकारों ने किया, लेकिन इस क्षेत्र में कोई बड़ी प्रगति नहीं हो सकी।

इस दफा सरकार अपनी इस योजना को लेकर गंभीर जान पड़ती है। वित्त मंत्री के बजट ऐलान के बाद सरकारी कंपनियों के स्टॉक्स में तेजी आई। निवेशकों ने सरकार के प्रस्ताव को एक पॉजिटिव संकेत के तौर पर देखा है।

सरकारी सेक्टर के बैंकों के निजीकरण पर सरकारें इस वजह से भी आगे नहीं बढ़ रही थीं क्योंकि यह एक राजनीतिक रूप से संवेदनशील मसला है। सरकार को मजबूत ट्रेड यूनियनों के गुस्से का सामना करना पड़ेगा। ये यूनियनें सख्ती से इस आइडिया का विरोध कर चुकी हैं।

सरकारी सेक्टर के बैंकों में सरकार के पास तगड़ी हिस्सेदारी है। इस सेक्टर में सरकार की जबरदस्त तरीके से मौजूदगी है। एक्सपर्ट्स राय दे चुके हैं कि ये चीज लंबे वक्त तक नहीं चल सकती है क्योंकि सरकार का काम कारोबार चलाना नहीं है।

इस तथ्य पर विचार कीजिए

मौजूदा वक्त में दिसंबर 2020 तक सरकार की कम से कम 10 बैंकों में 70 फीसदी से भी ज्यादा हिस्सेदारी है।

आठ बैंक ऐसे हैं जिनमें सरकार की हिस्सेदारी 80 फीसदी से भी ज्यादा है और तीन बैंकों में सरकारी स्टेक 90 फीसदी से ज्यादा है। ये बैंक हैं- इंडियन ओवरसीज बैंक, यूको बैंक और बैंक ऑफ महाराष्ट्र।

इस सेक्टर में कामकाजी दक्षता बढ़ाने, निजी पूंजी लाने और मार्केट में और प्रतिस्पर्धा पैदा करने के लिए निजीकरण को एक प्रभावी साधन के तौर पर देखा जाता रहा है।

सोमवार को वित्त मंत्री के दो और बैंकों में विनिवेश का ऐलान करने के बाद ग्लोबल रेटिंग एजेंसी मूडीज ने कहा है कि यह फैसला इस सेक्टर के लिए बेहतर साबित होगा।

मूडीज ने कहा है, “दो सरकारी बैंकों में सरकार के स्टेक बेचने का फैसला इन बैंकों के लिए क्रेडिट नेगेटिव है क्योंकि इससे इन बैंकों को मौजूदा सरकारी सपोर्ट मिलना बंद हो जाएगा। हालांकि, निजीकरण से ये बैंक ज्यादा मार्केट आधारित हो जाएंगे जो कि इस पूरी इंडस्ट्री के अच्छा होगा।”

मुंबई स्थित एसएमसी ग्लोबल सिक्योरिटीज के सीनियर बैंकिंग एनालिस्ट सिद्धार्थ पुरोहित ने भी कहा है कि सरकारी क्षेत्र के बैंकों में हिस्सेदारी बेचने का फैसला रिफॉर्म के लिहाज से बेहद अच्छी चीज है।

पुरोहित कहते हैं, “गुजरे वक्त में भी हमने इस तरह के ऐलान सुने हैं। लेकिन, इस बार सरकार ने इसका ऐलान बजट में किया है जो कि सरकार के मजबूत इरादों को दिखाता है।”

इसमें सबसे अहम बात इस विनिवेश योजना को लागू करना है। 2014 में पीजे नायक की अगुवाई वाले एक आरबीआई पैनल ने अपनी रिपोर्ट सौंपी थी और उसमें सिफारिश की थी कि सरकार को पब्लिक सेक्टर बैंकों में अपने मालिकाना हक को बेच देना चाहिए। लेकिन, निजीकरण के संदर्भ में यह रिपोर्ट बड़े तौर पर उपेक्षित बनी रही।

पूंजीकरण, लेकिन पर्याप्त नहीं

निजीकरण के ऐलान के अलावा, बैंकिंग सेक्टर के लिए अगली बड़ी प्राथमिकता पूंजी की किल्लत से जूझ रहे सरकारी बैंकों को सरकार से मिलने वाली पूंजी की मात्रा थी।

बजट में सीतारमण ने इस मद में वित्त वर्ष 2021-22 के लिए 20,000 करोड़ रुपये का ऐलान किया है।

वित्त वर्ष 2020-21 में अब तक सरकार ने बिना ब्याज वाली स्पेशल सिक्योरिटीज के जरिए सरकारी बैंकों में 5,500 करोड़ रुपये की फ्रेश कैपिटल डाली है।

सीतारमण ने बताया है कि सरकार ने 3 अन्य बैंकों में बॉन्ड्स जारी करने के जरिए भी पैसे डाले हैं। इन बैंकों में आईडीबीआई (4,557 करोड़ रुपये), एग्जिम बैंक (5,050 करोड़ रुपये) और आईआईएफसीएल (5,297.60 करोड़ रुपये) शामिल हैं।

20,000 करोड़ रुपये की पूंजी का ऐलान इन पीएसबी के लिए बेहद कम है। मूडीज के मुताबिक, पूंजी की भारी कमी से जूझ रहे इन बैंकों को बैड लोन्स से निपटने, रेगुलेटरी जरूरतें पूरी करने और बड़े उधार लेने वालों को कर्ज देने के लिए अगले दो साल में करीब 2 लाख करोड़ रुपये की पूंजी की जरूरत होगी।

कंसल्टिंग फर्म अर्न्स्ट एंड यंग ने बजट पर अपने नोट में कहा है, “20,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त पूंजी इन बैंकों के सामने मौजूद समस्याओं को देखते हुए बेहद कम है, लेकिन अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रहे बैंकों के विनिवेश से इसकी भरपाई की जा सकती है।”

भारत सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में सरकारी बैंकों में 3.16 लाख करोड़ रुपये की पूंजी डाली है। पिछले बजट में सरकार ने बैंकों में कोई भी पूंजी डालने का ऐलान नहीं किया था।

बैड बैंक-एक बड़ा आइडिया!

बैंकिंग सेक्टर के लिए इस बजट में वित्त मंत्री ने तीसरा बड़ा ऐलान एक एसेट रीकंस्ट्रक्शन-एसेट मैनेजमेंट कंपनी बनाने का किया है। इस इकाई को ‘बैड बैंक’ कहा जाएगा।

यह बैड बैंक एनपीए के चंगुल में बुरी तरह से फंस चुके बैंकों को एक बड़ी राहत देगा। ये बैड बैंक इन बैंकों के खराब एसेट्स को अपने पास ले लेगा और इस तरह से ये बैंक दोबारा से कर्ज देने की शुरुआत कर पाएंगे।

बैड बैंक के आइडिया को सीनियर बैंकरों और फाइनेंशियल सेक्टर के दूसरे एक्सपर्ट्स ने भी सपोर्ट किया है। इनका कहना है कि इससे बैड एसेट के जल्द निपटान में मदद मिलेगी।

डेट रिकवरी ट्राइब्यूनल्स और इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (आईबीसी) मैकेनिज्म कुछ बड़े मामलों तक ही सीमित रहे हैं। बैड बैंक से एक एआरसी मॉडल के जरिए बैड लोनों के निस्तारण में मदद मिल सकती है।

मई 2020 में आईबीए ने सरकार को इसका प्रस्ताव दिया था, लेकिन उस वक्त यह कॉन्सेप्ट लागू नहीं किया जा सका था।

ओवरऑल वित्त मंत्री ने 2021 के बजट में बैंकिंग सेक्टर के लिए एक रिफॉर्म का ब्लूप्रिंट दिया है। खासतौर पर सरकारी बैंकों के निजीकरण के लिहाज से यह एक बड़े रिफॉर्म को दिखाता है। हालांकि, इस प्लान की सफलता इसे लागू करने में छिपी है।

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