फाइनेंस मिनिस्टर निर्मला सीतारमण (Nirmala Sitharaman) आज अपना बहुप्रतीक्षित बजट पेश करने वाली हैं। उम्मीद है कि इस बजट में महामारी की मार से परेशान आम आदमी को राहत देने और हेल्थकेयर, इन्फ्रास्ट्रक्चर, डिफेंस जैसे सेक्टरों का खर्च बढ़ाकर इकोनॉमी में जान फूंकने की कोशिश की जाएगी।
उम्मीद है कि कोविड-19 से उभरते हुए मोदी सरकार के इस नौवें बजट में रोजगार बढ़ाने, ग्रामीण विकास और आम करदाता के हाथ में खर्च करने के लिए ज्यादा पैसे छोड़ने पर फोकस होगा। इसके अलावा बजट में विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने पर भी फोकस हो सकता है।
2019 में पेश अपने पहले बजट को फाइनेंस मिनिस्टर निर्मला सीतारमण ने लेदर के ब्रीफकेस की जगह परंपरागत लाल कपड़े से बने बही खाते के जरिए पेश किया था। फाइनेंस मिनिस्टर ने जनवरी महीने के शुरुआत में कहा था कि 1 अप्रैल से शुरू होने वाले इस नए वित्त वर्ष का बजट अभूतपूर्व होगा। जानकारों का कहना है कि इस बजट में वित्त मंत्री को कोविड महामारी से बिखरी अर्थव्यवस्था के टुकड़ों को जोड़ने से शुरू करना होगा। इस बार के बजट में वित्त मंत्री को सिर्फ बही खाते या लेजर अकाउंट से आगे बढ़कर नई शुरुआत करनी होगी। इस बजट को नई बोतल में पुरानी शराब से बढ़कर आगे कुछ होना होगा।
इस बजट में वित्त मंत्री से दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी इकोनॉमी के लिए आगे की विजन की जरूरत है। अर्थशास्त्रियों के बीच इस बात को लेकर आम सहमति है कि वित्त वर्ष 2021 की एनुअल GDP में 7-8 फीसदी की गिरावट देखने को मिलेगी जो विकासशील देशों में सबसे कमजोर ग्रोथ में से एक है। सरकार को अब इकोनॉमी को गड्ढ़े से निकालने के लिए अहम भूमिका निभानी होगी। इस बीच अच्छी बात ये है कि कोरोना महामारी के कम खतरनाक होने के संकेत मिल रहे हैं। इसके अलावा वैक्सीनेशन प्रोग्राम में क्रमिक प्रगति बेहतर भविष्य की उम्मीद जगा रही है। एक टिकाऊ इकोनॉमिक रिवाइवल के लिए नीतिगत सुधारों की जरूरत होगी और यहीं बजट की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
देश में कोरोना का हमला उस समय हुआ जब इकोनॉमी पहले से ही मुश्किलों के दौर से गुजर रही थी। 2019-20 में GDP 4 फीसदी के अपने 11 साल के निचले स्तर पर पहुंच गई थी। कोरोना के पहले गिरती निवेश दर (declining investment rate) चिंता का बड़ा मुद्दा थी। इसी बीच कोरोना के चलते देश भर में लागू लॉकडाउन ने कोढ़ में खाज का काम किया और पूरे देश में आर्थिक गतिविधियां ठप सी पड़ गईं जिसके चलते वित्त वर्ष 2021 की लगातार दो तिमाहियों में GDP में भारी गिरावट देखने को मिली और देश की अर्थव्यवस्था मंदी में चली गई।
इन चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार ने आत्म निर्भर भारत पैकेज 1.0, 2.0 और 3.0 के तहत तमाम नीतिगत कदम उठाए जिससे अर्थव्यवस्था को सपोर्ट मिल सके। ये पैकेज अनुदान, केंद्र सरकार द्वारा इक्विटी और लिक्विडटी बढ़ाने के उपाय, राज्य सरकारों और रिजर्व बैंकों द्वारा दिए गए तमाम राहतों के रूप में आए। हालांकि सुर्खियों में रहे राहत पैकेज की राशि 21 लाख करोड़ रुपये रही, लेकिन इस आर्थिक राहत पैकेज का वास्तविक वित्तीय प्रभाव करीब 3.5 लाख करोड़ का रहा जो GDP 1.8 फीसदी होता है।
इसके अलावा ध्यान रखने की बात यह भी है कि पिछले बजट से इस बजट तक भारत की इकोनॉमी के साइज में भी संकुचन आया है। ये 2.24 लाख करोड़ से घटकर 1.94 लाख करोड़ के आसपास आ गई है। कोरोना महामारी के प्रभाव के चलते कर उगाही में गिरावट आई है। इसकी तुलना में खर्च बढ़ा है। बजट में इस बात पर नजरें रहेंगी कि वित्त वर्ष 2022 में वैक्सीन पर आने वाला खर्च कितना होगा और इस खर्च में राज्य सरकारों, केंद्र सरकार और आम आदमी की हिस्सेदारी कितनी होगी। भारत में 16 जनवरी से दुनिया का सबसे बड़ा वैक्सीनेशन प्रोग्राम शुरू किया है। इसके तहत 2 वैक्सीन कोवीशील्ड और कोवैक्सीन दी जा रही है।
इसके अलावा इस बात पर भी नजरें रहेंगी कि सरकार भारत पेट्रोलियम (BPCL), Air India और Shipping Corporation of India (SCI) जैसे PSU के विनिवेश से कितना पैसा जुटाने का लक्ष्य रखती है।
उम्मीद है कि इस बजट में बाजार से ली जाने वाली उधारी का लक्ष्य ज्यादा बना रहेगा और एक्सटर्नल डिफिसिट फाइनेंसिंग (external deficit financing) में भी बढ़त देखने को मिलेगी। इसके अलावा इस बजट में नेशनल इन्फ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन (National Infrastructure Pipeline -NIP) प्रोग्राम और हाल ही में पेश प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेटिव स्कीम के लिए बड़ा वित्तीय आवंटन हो सकता है। बता दें कि NIP के लिए 2020 से 2025 तक के लिए कुल 111 लाख करोड़ रुपये का निवेश टारगेट रखा गया है। वहीं PLI स्कीम का मकसद घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए विदेशी निवेशकों को आकर्षित करना है।
Acuit Ratings & Research Limited का कहना है कि मौजूदा परिस्थितियों में सरकार के पास 2 अहम लक्ष्य हैं। इसमें से पहला है इकोनॉमी की ग्रोथ को ठहरी हुई गाड़ी को आगे बढ़ाना और मीडियम टर्म में फिस्कल कंसोलिडेशन पर फोकस करना है। सरकार की ग्रोथ को बढ़ावा देने की कोशिशों से नियर टर्म में डिमांड में बढ़त दिखनी चाहिए और मध्यम से लंबी अवधि में इकोनॉमी की गति में बढ़त बनी रहनी चाहिए।
Dun and Bradstreet के अरुण सिंह का कहना है कि अभूतपूर्व परिस्थियों में अभूतपूर्व कदम उठाने की भी जरूरत होती है। ऐसे में सरकार को अर्थव्यवस्था को टिकाऊ गति देने के लिए इन्फ्रास्टक्चर के विकास, इंडस्ट्री के सभी सेक्टरों में बड़ी मात्रा में निजी और विदेशी निवेश, सर्विस और कृषि सेक्टर के विकास, लोगों की निजी खपत में विकास पर फोकस करना होगा। इसके लिए पब्लिक प्राइवेट भागीदारी अहम भूमिका निभा सकती है। इसके अलावा हेल्थ और एजूकेश में भी खास फोकस होना चाहिए।
एक लीडिंग डेटा एंड एनालिक्स कंपनी ग्लोबल डेटा का कहना है कि समय की मांग यह है कि छोटे और मझोले उद्योगों के लिए कर्ज की सुविधा बढ़ाई जाए। इसके साथ ही प्रोडक्शन और खपत बढ़ाने के लिए एजूकेशन और हेल्थ सेक्टर पर निवेश बढ़ाया जाए। ग्लोबल डेटा की गार्गी राव का कहना है कि 1 फरवरी को आने वाले बजट में इन्फ्रास्टक्चर डेवलपमेंट, सीनियर सिटीजन के लिए टैक्स में छूट और डोमेस्टिक प्रोडक्शनन बढा़ने पर फोकस रहने की उम्मीद है।
इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स (Indian Chamber of Commerce - ICC) का कहना है कि यह बजट कोरोना महामारी से जूझ रही अर्थव्यवस्था के लिए एक इकोनॉमिक वैक्सीन के रूप में आएगा और भारतीय अर्थव्यवस्था में मांग, कंज्यूमर कॉन्फिडेंस और लोगों की परचेजिंग पावर बढ़ाने का काम करेगा। ICC के इस बयान में आगे कहा गया है कि उम्मीद है कि यह बजट टेक्सटाइल, रेडीमेड कपड़े, लेदर, फूड प्रोसेसिंग, कंस्ट्रक्शन और रिटेल जैसे सेक्टर के लिए इंसेटिव लेकर आएगा।
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