Budget 2023: एग्रीकल्चर में रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) पर इनवेस्टमेंट बढ़ाने से कई तरह से फायदा होता है। कृषि उत्पादकता बढ़ती है। लॉस घटता है। किसानों की इनकम बढ़ती है। इसलिए इस बजट में कृषि क्षेत्र में आरएंडडी के लिए आवंटन बढ़ाने की जरूरत है। आरएंडडी के कई फायदे बताने के लिए मैं दो उदाहरण पेश कर सकता हूं। करीब एक दशक तक उत्तर भारत में Co 0238 किसानों के लिए गन्ना की पसंदीदा वेरायटी थी। इसे 1997-2009 के बीच इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च (ICAR) के दो शुगरकेन ब्रीडिंग सेंटर में विकसित किया गया था। इसे विकसित करने वाले बख्शी राम के मुताबिक, 2020 के प्राइसेज पर इस पर 347 करोड़ रुपये की कॉस्ट आई थी। यह दोनों इंस्टीट्यूट्स के कई सालों के बजट के बराबर था। इसे 2009 में मार्केट में पेश किया गया। तब से लेकर 2020 तक पांच उत्तरी राज्यों में 53 फीसदी गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में इसका इस्तेमाल हो रहा है। इनमें उत्तर प्रदेश और बिहार शामिल हैं। इस गन्ने के इस्तेमाल से ज्यादा चीनी बनती है। राम का अनुमान है कि इस वेरायटी के इस्तेमाल से अतिरिक्त 67,110 करोड़ रुपये का रेवेन्यू हो चुका है।
दिल्ली के इंडियन एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीट्यूट (IARI) में विकसित पूसा बासमती की वेरायटी की कहानी भी गन्ने की Co 0238 जैसी है। यह जानकर आप चौंक सकते हैं कि एक समय ऐसा था जब किसानों को सामान्य चावल की खेती में ज्यादा मुनाफा दिखता था और वे बासमती की खेती से दूरी बना रहे थे। इस ट्रेंड में बदलाव के लिए बासमती की खेती के लिए ज्यादा मुनाफा वाली बनना जरूरी था। पूसा वेरायटी 1989 में आई। इसे विकसित करने में 24 साल लगे। सामान्य चावल से 40 सेमी छोटी इस वेरायटी की तब ज्यादा मांग नहीं थी। 14 साल बाद 2003 में IARI ने PB 1121 वेरायटी जारी की। अब बासमती इंडिया का टॉप एग्रीकल्चरल एक्सपोर्ट बन गया है। 2010-16 के बीच देश में बासमती उत्पादक इलाकों के 68 फीसदी हिस्सों में इसकी खेती हो रही है। IARI के अनुमान के मुताबिक, पिछले सालों में इसमें हुए कारोबार की वैल्यू 1.5 लाख करोड़ रुपये है। तब से जल्द तैयार होने वाले और बैक्टिरिया प्रतिरोधी कई नए वर्जन आ चुके हैं। आधुनिक टेक्नोलॉजी की मदद से इन्हें काफी समय में विकसित किया गया है।
न सिर्फ उत्पादकता बढ़ाने के लिए रिसर्च जरूरी है बल्कि फसलों को कीट, पैथोजेंस और प्रतिकूल मौसम से बचाने के लिए भी यह जरूरी है। BT Cotton से कपास के उत्पादन में आ रही गिरावट के ट्रेंड को बदलने में मदद मिली है। आयात पर हमारी निर्भरता भी घटी है। बीटी कॉटन में मिट्टी की बैक्टिरिया का जीन होता है, जो बोल बोरिंग वॉर्म्स को नुकसान पहुंचाता है।
अगले साल इंडिया के दुनिया में सबसे ज्यादा आबादी वाला देश बन जाने की उम्मीद है। ऐसे में हमें आबादी की खाद्यान्न की जरूरतें पूरी करने के लिए ज्यादा वैज्ञानिक समाधान की जरूरत है। हमें ऐसे फसलों पर फोकस बढ़ाना होगा जिन पर मौसम की प्रतिकूल स्थितियों का असर नहीं पड़ता है। हमें ऐसी फसल चाहिए जो कम जगह, पानी, फर्टिलाइजर और क्रॉप प्रोटेक्शन केमिकल लेती हो।
दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) के पूर्व वीसी दीपक पेंटल का कहना है कि एग्रीकल्चर में आरएंडडी बढ़ाने के कई मकसद हैं। इनमें क्रॉप डायवर्सिफिकेशन, क्रॉप रोटेशन, मिट्टी की क्वालिटी पर असर नहीं डालने वाली खेती, पानी का कम इस्तेमाल और ज्यादा उत्पादकता शामिल हैं। पेंटल डीयू के वैज्ञानिकों की उस टीम के प्रमुख थे, जिसने जिनेटिकल-मोडिफायड हाइब्रिड तैयार किया था। सरकार ने अक्टूबर में इसके उत्पादन के लिए एप्रूवल दे दिया। उन्होंने कहा कि इंडिया में पेस्ट और पैथोजेन रेसिस्टेंट फसल तैयार करने वाली रिसर्च की कमी है। यह एक ऐसा क्षेत्र है, जिसमें लगातार रिसर्च जरूरी है। उन्होंने कोविड-19 का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि पेस्ट और होस्ट (जिस पर कीड़े पलते हैं) के बीच वजूद की लड़ाई चलती रहती है। ये एक दूसरे को पराजित करने की कोशिश करते रहते हैं।
(विवियन फर्नांडीस सीनियर बिजनेस जर्नलिस्ट हैं। उन्हें तीन दशकों से ज्यादा का अनुभव है। यहां व्यक्त विचार उनके व्यक्तिगत हैं। यह इस पब्लिकेशन के नहीं हैं।)