मोदी सरकार के कार्यकाल में भारतीय रेलवे की तस्वीर काफी बदल चुकी है। सबसे बड़ा बदलाव जो देखा गया वो है रेल बजट का आम बजट में मिलना। इस ऐतिहासिक फैसले के बाद संसद का वक्त तो बचा ही, फरमाइशी ट्रेनें चलाने का राजनीतिक दबाव भी कम हुआ है।
रेल बजट को यूनियन बजट में मिलाने का मोदी सरकार का फैसला अब रंग लाता दिख रहा है। फैसले के बाद रेल के संचालन और विकास के लिए वित्त मंत्रालय से आर्थिक मदद बढ़ने की उम्मीद ज्यादा हो गयी। इसके अलावा हर साल वित्त मंत्रालय को रेलवे की ओर से दिए जाने वाले करीब 10 हजार करोड़ के डिविडेंड की देनदारीभी खत्म हो गई। जानकारों के मुताबिक इस फैसले से संसद के समय की तो बचत है ही साथ ही बजट को मूल्यांकन करने का नज़रिया बदला है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सपना भारतीय रेल को अर्थव्यवस्था का ग्रोथ इंजन बनाना है, इसी ओर ये पहला कदम साबित हो रहा है। साल 2017 में तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 92 साल पुरानी अलग रेलवे बजट की प्रथा को खत्म कर, एक यूनियन बजट पेश करने का फैसला लिया और इसके साथ ही हर साल बजट पेश करने की तारीख भी 1 फरवरी तय कर दी गयी।
रेल बजट के आम बजट में मिलने का ही असर है जो रेल मंत्रालय ने अपने स्तर पर नॉन फेयर रेवेनुए के ज़रिए पैसा कमाने की कवायद भी तेज कर दी है, ताकि किसी भी तरह की आर्थिक तंगी रेल के विकास में आड़े न आये।
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