Union Budget 2023: वित्त वर्ष 2024 का विनिवेश लक्ष्य 51000 करोड़ रुपये रखा गया

Union Budget 2023: Goldman Sachs का कहना है कि 2024 में होने वाले आम चुनाव को देखते हुए सरकार अपने विनिवेश लक्ष्य को बहुत आक्राम तरीके से आगे बढ़ाने की स्थिति में नहीं है

अपडेटेड Feb 01, 2023 पर 4:35 PM
वित्त वर्ष 2018 और 2019 को छोड़कर पिछले 8 सालों में विनिवेश का बजटीय लक्ष्य कभी भी पूरा नहीं हुआ है

Union Budget 2023: वित्त मंत्रालय की तरफ से जारी किए गए बजट डॉक्यूमेंट्स के मुताबिक सरकार वे वित्त वर्ष 2024 के लिए विनिवेश लक्ष्य 51000 करोड़ रुपए रखा है। 2022 में निजीकरण की धीमी गति और बाजार की प्रतिकूल परिस्थियों को देखते हुए वित्त वर्ष 2024 के लिए तय किया गया विनिवेश लक्ष्य उम्मीद के मुताबिक ही है। बता दें कि वित्त वर्ष 2023 में सरकार ने 65000 करोड़ रुपए के विनिवेश का लक्ष्य रखा था। बाद में इसके संशोधित करके 50000 करोड़ रुपए कर दिया गया था। हालांकि सरकार ने पीएसयू में स्टेक सेल के जरिए वित्त वर्ष 2023 में अब तक सिर्फ 31000 करोड़ रुपए जुटाए हैं।

इस बात की आशंका नजर आ रही है कि सरकार वित्त वर्ष 2023 के अपने लक्ष्य को हासिल करने में सफल नहीं हो पाएगी। क्योंकि 31 मार्च के पहले सरकार का कोई बड़ा विनिवेश लक्ष्य पूरा होने की संभावना नहीं दिख रही है। वित्त वर्ष 2023 में हुए 31000 करोड़ रुपये के विनिवेश में भी एक बड़ा हिस्सा LIC के आईपीओ से आया है। LIC मई 2022 में आईपीओ के जरिए बाजार से 21000 करोड़ रुपये जुटाए थे।

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Goldman Sachs की हाल में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2018 और 2019 को छोड़कर पिछले 8 सालों में विनिवेश का बजटीय लक्ष्य कभी भी पूरा नहीं हुआ है। वित्त वर्ष 2021 और 2022 में सरकार ने विनिवेश के अपने बजटीय लक्ष्य का सिर्फ 18 और और 8 फीसदी हासिल किया था। पिछले कुछ सालों से BPCL, Shipping Corporation, BEML, Concor, HLL Lifecare and NMDC Steel के विनिवेश की कोशिश हो रही है। Goldman Sachs का कहना है कि 2024 में होने वाले आम चुनाव को देखते हुए सरकार अपने विनिवेश लक्ष्य को बहुत आक्राम तरीके से आगे बढ़ाने की स्थिति में नहीं है।

इसी तरह Kotak Institutional Equities ने अपने एक प्री-बजट रिसर्च नोट में कहा है कि वित्त वर्ष 2023 में सरकार विनिवेश के जरिए 350 अरब रुपये जुटा सकती है। वही वित्त वर्ष 2024 में यह आंकड़ा 500 अरब रुपये हो सकता है। Kotak Institutional Equities को भी लगता है कि सरकार आम चुनाव को ध्यान में रखते हुए अपने प्राइवेटाइजेशन के एजेंडे को तेजी से आगे नहीं बढ़ा पाएगी।

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