टी के अरुण
टी के अरुण
Budget 2023: फिस्कल डेफिसिट पर नजर रखने वाली रेटिंग एजेंसियों और एनालिस्ट्स को सरकार की तारीख करनी चाहिए, क्योंकि सुस्ती पड़ती ग्लोबल इकोनॉमी के बीच इंडियन इकोनॉमी ने अच्छी रिकवरी दिखाई है। अब इंडिया को नई सोच के साथ आगे बढ़ना होगा। ऐसे बड़े प्रोजेक्ट में इनवेस्ट करना होगा, जिससे इंडिया में बनने वाली मशीन और मैटेरियल के लिए अच्छी मांग पैदा हो सके। साथ ही जिसमें देश के कुशल और अकुशल श्रम को इंगेज करने की गुंजाइश हो। नई सिटी (City) बनाना एक अच्छा विकल्प है। नई सिटी बनाने में पैसे का इंतजाम करने से ज्यादा चुनौतीपूर्ण प्रोजेक्ट की प्लानिंग, प्रोजेक्ट डेवलपमेंट और समन्वय है। आम तौर पर किसी सिटी का मालिकाना हक किसी व्यक्ति या कंपनी के पास नहीं होता है।
नई सिटी का मालिकाना हक ऐसे कई इंडीविजुअल्स के पास हो सकता है, जिन्हें नई सिटी में अपने लिए और देश के लिए बड़े मौके दिख रहे हैं। चीन की दो-तिहाई आबादी शहरों में रहती है। इंडिया में यह अनुपात इसका आधा है। कोई देश तब विकास करता है जब नॉन-ट्रेडिशनल सेक्टर्स, इंडस्ट्री और सर्विसेज ग्रोथ दिखाती हैं। इनकी ग्रोथ ज्यादातर शहरों में होती है। नई नौकरियां ऐसे सेक्टर में पैदा होती हैं, जिनकी ग्रोथ एग्रीकल्चर जैसे ट्रेडिशनल सेक्टर के मुकाबले तेज होती है। लोग रोजगार के लिए गांव से शहर जाते हैं और इस तरह शहरीकरण बढ़ता है।
मौजूदा शहरों का घुटने लगा है दम
वर्ल्ड बैंक के डेटा के मुताबिक, दुनिया की 56 फीसदी आबादी शहरों में रहती है। GDP में इनका 80 फीसदी योगदान होता है। 2011 के डेटा के मुताबिक, इंडिया में करीब 33 फीसदी लोग शहरों में रहते हैं। अब यह बढ़कर करीब 35 फीसदी हो गया होगा। अभी इंडिया की आबादी 1.42 अरब है। इस तरह शहरों में रहने वाले लोगों की संख्या करीब 50 करोड़ होगी। 2051 में इंडिया की आबादी 1.67 अरब हो जाएगी। अगर तब तक इंडिया की 50 फीसदी आबादी शहरों में रहने लगेगी तो शहरों में रहने वाले लोगों की संख्या बढ़कर 83.5 करोड़ पहुंच जाएगी। इसका मतलब है कि शहरी आबादी में 33.5 करोड़ की वृद्धि होगी।
इस अतिरिक्त आबादी को इंडिया के लिए मौजूदा छोटे-बड़े शहरों में जगह बनाना मुमकिन नहीं होगा चाहे हम उनका कितना भी विस्तार क्यों न कर लें। इंडिया में हजारों वर्ग किलोमीटर शहरी स्पेस की जरूरत होगी। अगर प्रति वर्ग किलोमीटर 25,000 जनसंख्या घनत्व को मान लें तो इस हिसाब से 13,400 वर्ग किलोमीटर अतिरिक्त शहरी स्पेस की जरूरत होगी।
अगर हमें ज्यादा खुली जगह चाहिए तो हमें प्रति वर्ग किलोमीटर 15,000 जनसंख्या घनत्व के बारे में सोचना होगा। इस हिसाब से हमें नए 22,300 किलोमीटर शहरी इलाके की जरूरत होगी। दिल्ली राज्य का एरिया 1,483 वर्ग किलोमीटर में है। इसका मतलब है कि इंडिया को 15 नए शहरों की जरूरत पड़ेगी। इनमें से हर शहर का आकार दिल्ली जितना होगा।
लैंड पूलिंग से निकल सकता है रास्ता
नया शहर बनाने में सबसे बड़ी चुनौती जमीन को खाली कराने की है। इस काम को केंद्र के बजाय राज्य सरकारें आसानी से कर सकती हैं। इस बात का ऐलान किया जा सकता है कि जो राज्य बुनियादी सुविधाओं के साथ 100 वर्ग किलोमीटर जमीन उपलब्ध कराएगी वहां केंद्र सरकार नई सिटी बनाने का प्रोजेक्ट शुरू कर सकती है। नए शहरों का पुराने शहरों के करीब स्थित होना जरूरी नहीं है। उनका सिर्फ हाईवे के करीब होना जरूरी है। अमरावती के मॉडल पर जमीन की पूलिंग की जा सकती है। चंद्रबाबु नायडू चुनाव हारने से पहले आंध्र प्रदेश के लिए यह शहर बना रहे थे। इसमें जमीन के मालिकों ने इस वादे के साथ अपनी जमीन दी थी कि डेवलपमेंट के बाद उन्हें अपनी जमीन के बदले कुछ शहरी लैंड मिलेगा।
नए शहर एनर्जी की कम खपत वाले होंगे। उसमें लोगों को एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए आसान सुविधाएं उपलब्ध होंगी। कानून-व्यवस्था बेहतर होगी। मिक्स्ड लैंड यूज होगा। और दूसरे शहरों के साथ कनेक्टिविटी के लिए बेहतर सुविधा होगी।
सरकार कैसे कर सकती है मदद?
सरकार को इसके लिए व्यापक प्लानिंग करनी होगी। अबर्न गवर्नेंस के लिए मजबूत फ्रेमवर्क तैयार करना होगा। म्युनिसिपल बॉन्ड के लिए अच्छा बाजार जरूरी है। शहर बनाने के लिए खर्च का प्रबंध इन्हीं बॉन्ड के जरिए होगा। अगर इनवेस्टर्स को सिटी प्रोजेक्ट के लिए अच्छी संभावना दिखाई देगी तो पैसे की कमी आड़े नहीं आएगी।
(टीके अरुण सीनियर जर्नलिस्ट हैं। यहां व्यक्त विचार उनके अपने विचार हैं, वे इस पब्लिकेशन के विचार नहीं हैं)
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