E-commerce vs Kirana Stores: ऑनलाइन शॉपिंग के चलते पड़ोस के किराना स्टोर्स परेशान, अब सरकार से मिलेगा सपोर्ट?

E-commerce vs Kirana Stores: देश में क्विक कॉमर्स इंडस्ट्री तेजी से बढ़ रही है। अब कई मंत्रालय इस बात की जांच करेंगे कि कहीं इसका पारंपरिक मॉम-एंड-पॉप स्टोर्स यानी किराना स्टोर्स के कारोबार पर निगेटिव इफेक्ट तो नहीं पड़ रहा है। हालांकि मनीकंट्रोल से बातचीत में सूत्र ने कहा कि अभी सरकार की नीतिगत हस्तक्षेप की कोई योजना नहीं है

अपडेटेड Aug 28, 2024 पर 4:43 PM
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सूत्र के मुताबिक ई-कॉमर्स बनाम किराना का मामला अभी शुरुआती अवस्था में है लेकिन इंडस्ट्री के एग्जीक्यूटिव्स परेशान हैं।

E-commerce vs Kirana Stores: देश में क्विक कॉमर्स इंडस्ट्री तेजी से बढ़ रही है। अब कई मंत्रालय इस बात की जांच करेंगे कि कहीं इसका पारंपरिक मॉम-एंड-पॉप स्टोर्स यानी किराना स्टोर्स के कारोबार पर निगेटिव इफेक्ट तो नहीं पड़ रहा है। हालांकि मनीकंट्रोल से बातचीत में सूत्र ने कहा कि अभी सरकार की नीतिगत हस्तक्षेप की कोई योजना नहीं है। इसे लेकर कॉमर्स और कंज्यूमर अफेयर्स से जुड़े मंत्रालय ई-कॉमर्स से जुड़े गुणवत्ता से लेकर बाकी सभी पॉलिसी के मानकों पर तुलना करेंगे। हालांकि अभी इसे लेकर नौकरशाही स्तर पर ही काम हो रहा है और यह शुरुआती चरण में है।

किराना स्टोर्स को लेकर केंद्रीय मंत्री जता चुके हैं चिंता

इस महीने की शुरुआत में नई दिल्ली में एक कार्यक्रम में कॉमर्स मिनिस्टर पीयूष गोयल ने कहा था कि ई-कॉमर्स की तेजी गर्व की नहीं बल्कि चिंता की बात है। उन्होंने कहा कि यह मैटर ऑफ प्राइड नहीं बल्कि मैटर ऑफ कंसर्न है। उन्होंने आगे कहा कि छोटे व्यापारियों और बड़े रिटेलर्स के बीच काफी गैप बन चुका है और छोटे व्यापारी नीचे खिसक रहे हैं। सिर्फ केंद्रीय मंत्री ही नहीं, बल्कि FMCG की एमआरपी तय करने वाले ऑल इंडिया कंज्यूमर प्रोडक्ट्स डिस्ट्रीब्यूटर फेडरेशन (AICPDF) का भी कहना है कि ब्लिंकिट, जेप्टो, स्विगी, इंस्टामार्ट, बिग बास्केट (अब BB) और फ्लिपकार्ट मिनट्स जैसे क्विक कॉमर्स कंपनियों की तेजी से छोटे रिटेलर्स के कारोबार को झटका लगा है। फेडरेशन ने क्विक कॉमर्स के ताबड़तोड़ तेजी के जांच की अपील की है।


अगर कार्रवाई हुई तो ई-कॉमर्स के अस्तित्व पर आ जाएगा संकट?

सूत्र के मुताबिक ई-कॉमर्स बनाम किराना का मामला अभी शुरुआती अवस्था में है लेकिन इंडस्ट्री के एग्जीक्यूटिव्स परेशान हैं। उनका कहना है कि अगर मिनिस्ट्री क्विक कॉमर्स मॉडल के पीछे पड़ती हैं तो कंपनियों को अपना कारोबार बंद करना होगा या अपने बिजनेस मॉडल को पूरी तरह बदलना होगा। इससे 500 करोड़ डॉलर के क्विक कॉमर्स मार्केट को झटका लग सकता है। एक इंडस्ट्री एग्जीक्यूटिव ने कहा कि अगर कंज्यूमर अफेयर्स डिपार्टमेंट कंपनियों को अधिक पारदर्शी होने, एक्सपायरी डेट स्पष्ट तरीके से दिखाने, रिटर्न प्रोसेस को और आसान बनाने या इसके अलावा और छोटे-छोटे आदेश देती है तो इसे किया जा सकता है। एग्जीक्यूटिव के मुताबिक एफडीआई से जुड़े मुद्दे पर अगर कोई दिक्कत आती है तो अस्तित्व का संकट आ सकता है। मिनिस्ट्री ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के डिपॉर्टमेंट फॉर प्रमोशन ऑफ इंडस्ट्री एंड इंटर्नल ट्रेड (DPIIT) मुख्य रूप से एफडीआई से जुड़े उल्लंघनों को देखती है। वहीं मिनिस्ट्री ऑफ कंज्यूमर अफेयर्स, फूड एंड पब्लिक डिस्ट्रिब्यूशन क्वालिटी कंट्रोल जैसे मुद्दे देखती है।

किस मुद्दे पर फंस सकती हैं कंपनियां?

भारत में वैश्विक ई-कॉमर्स कंपनियां मार्केटप्लेस बिजनेस के रूप में स्वतंत्र तौर पर कारोबार कर सकती हैं लेकिन ऑनलाइन ही। मल्टी-ब्रांड रिटेल में 51 फीसदी तक ही एफडीआई को मंजूरी मिली हुई है और वह भी स्थानीय साझेदारी के जरिए और इसके लिए भी सरकारी मंजूरी की आवश्यकता होती है। वहीं फूड रिटेल में 100 फीसदी एफडीआई की मंजूरी है और ये ऑनलाइन के साथ-साथ ऑफलाइन भी चल सकती है लेकिन जरूरी है कि फूड प्रोडक्ट्स भारत में ही तैयार हुआ हो। अब मामला यहां फंसता है कि कुछ क्विक कॉमर्स स्टार्टअप प्रोडक्ट्स जुटाते हैं और इसे दूसरे कारोबारियों को बेच देते हैं जो अपने ऐप या प्लेटफॉर्म के जरिए इसे ग्राहकों के बेचते हैं और इस तरीके से क्विक कॉमर्स कंपनी खुद को बी2सी की बजाय बी2बी दिखाती हैं। इससे वे सरकार की नजरों से दूर रहती हैं।

शुरुआती दिनों में फ्लिपकार्ट भी ऐसे ही काम करती थी। अब सरकार का आदेश है कि एफडीआई वाली कंपनियां सिर्फ मार्केटप्लेस मॉडल चला सकती हैं, इंवेंटरी नहीं रख सकती हैं तो सरकार ऊपर दिए गए तरीके को सीधे कह सकती है कि यह गलत है। सूत्र के मुताबिक अब सरकार यहां ये कर सकती है कि कंपनियों को किराना इकोसिस्टम में काम करने के लिए कहा जाए। हालांकि इसे लेकर नियमों में बदलाव करना होगा और इससे ई-कॉमर्स कंपनियों के साथ-साथ किराना स्टोर्स को भी सपोर्ट मिलेगा।

डाटुम इंटेलिजेंस के एडवाइजर और स्वतंत्र ई-कॉमर्स एनालिस्ट सतीश मीना के कहना है कि क्विक कॉमर्स सिर्फ टॉप के 8-10 शहरों में ही बढ़ रहा है तो इस छोटे पैमाने पर सरकार के हस्तक्षेप की अभी जरूरत नहीं है। उन्होंने ये भी कहा कि क्विक कॉमर्स कंपनियों की बदौलत नौकरियां तैयार हो रही हैं और विदेशी निवेश भी आ रहा है। ई-कॉमर्स की पैरवी करते हुए उन्होंने यह भी कहा कि तकनीक जैसे-जैसे बढ़ेगी, बदलाव तो स्वाभाविक है।

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