RBI बढ़ाएगा ब्याज दर? El Nino और Iran-US War के चलते Zerodha के नितिन कामत ने जताई आशंका

पिछले एक साल से केंद्रीय बैंक RBI ने महंगाई की चिंताओं और देश-विदेश में आर्थिक सुस्ती के बीच संतुलन बनाते हुए सतर्क नीतिगत रुझान बनाए रखा है। हालांकि अब सामान्य से कम बारिश के अनुमान और ईरान-अमेरिका युद्ध ने मुश्किल स्थित बना दी है। ऐसा जीरोधा (Zerodha) के को-फाउंडर नितिन कामत का मानना है। जानिए अगले महीने होने वाली मौद्रिक नीतियों के कमेटी की बैठक में आरबीआई क्या फैसला ले सकता है

अपडेटेड May 26, 2026 पर 11:08 AM
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इकनॉमिस्ट्स का लंबे समय से मानना है कि खाने-पीने की चीजों के बढ़ते भाव और तेल की कीमतों में उछाल मिलकर RBI के लिए सबसे कठिन परिस्थितियों में से एक बना देते हैं।

दिग्गज ब्रोकरेज फर्म जीरोधा (Zerodha) के सीईओ नितिन कामत (Nithin Kamath) ने चेतावनी दी है कि अगर कमजोर मानसून के साथ अमेरिका-ईरान युद्ध के चलते तेल कीमतें लगातार ऊंची बनी रहती हैं, तो देश को इस साल महंगाई के कठिन दौर का सामना कर सकता है। उनका मानना है कि अगर ऐसी स्थिति रहती है तो आरबीआई को मौद्रिक नीति सख्त करनी पड़ सकती है। X (पूर्व नाम Twitter) पर एक पोस्ट में जीरोधा के फाउंडर ने साल 2026 को 'जब मुसीबत आती है तो चारों तरफ से आती है' जैसी स्थिति वाला बताया। उन्होंने जिक्र किया कि सामान्य से कम बारिश का पूर्वानुमान खाने-पीने के चीजों की महंगाई और गांवों में लोगों की कमाई के लिए बड़ा खतरा है।

El Nino कितना बड़ा खतरा?

नितिन कामत का कहना है कि हर कुछ साल में प्रशांत महासागर असामान्य रूप से गर्म हो जाता है जिसे अल नीनो कहते हैं और जब ऐसा होता है, तो देश में मानसून कमजोर पड़ जाता है। उन्होंने जिक्र किया कि भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने इस साल बारिश के सामान्य से 6% कम रहने का अनुमान लगाया है। नितिन कामत के मुताबिक पहली नजर में यह मामूली लग सकता है, लेकिन देश की लगभग 70% सालाना बारिश मानसून के दौरान होती है और लगभग 60% किसान अब भी सिंचाई की बजाय मुख्य रूप से बारिश पर निर्भर हैं।


बारिश को लेकर उन्होंने इतिहास का उदाहरण देते हुए कहा कि यह साल बहुत बुरा साबित हो सकता है। साल 1951 के बाद से जिस भी साल अन निनो की स्थिति बनी, उसमें से करीब 60% वर्षों में बारिश औसत से कम रही। साल 2009 में तो माससून लॉन्ग-पीरियड एवरेज का महज 78% ही रहा जोकि 37 वर्षों का सबसे कमजोर मानसून था। कमजोर मानसून से खेतों में उत्पादन प्रभावित होता है, खासतौर से चावल, दालें, चीनी और सब्जियों जैसी फसलों को, जिससे खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़ते हैं। चूंकि घरेलू खर्च में इनकी बड़ी हिस्सेदारी रहती है तो फूड इनफ्लेशन रिटेल इनफ्लेशन का अहम हिस्सा बना हुआ है।

तेल भी कर रहा परेशान

नितिन कामत के मुताबिक कमजोर मानसून का खतरा ऐसे समय उभर रहा है जब पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के चलते ग्लोबल एनर्जी मार्केट पहले से दबाव में हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति का जिक्र करते हुए उन्होंने इसे “अव्यवस्थित संकट” बताया, क्योंकि यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण एनर्जी शिपिंग रूट में शुमार है। अमेरिका और ईरान के बीच चल रही लड़ाई ने उस समुद्री रास्ते को बंद कर दिया, जहां से दुनिया का 20% तेल और 20% एलएनजी गुजरता है। चूंकि भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का करीब 80-90% और प्राकृतिक गैस खपत का लगभग आधा हिस्सा आयात करता है, तो इनकी कीमतों में लंबे समय तक बढ़ोतरी देश की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा खतरा बन जाती है।

अप्रैल में भारतीय क्रूड बास्केट का प्रति बैरल औसतन $114 और मई में करीब $106 का भाव नितिन कामत के मुताबिक देश के कंफर्ट जोन से काफी ऊपर है। नितिन कामथ के मुताबिक कच्चे तेल की ऊंची कीमतें पेट्रोल-डीजल के भाव, ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट, खाद पर खर्च और चालू खाते के घाटे में उछाल के जरिए इकॉनमी पर असर डालती है।

RBI के सामने ये है दिक्कत

इकनॉमिस्ट्स का लंबे समय से मानना है कि खाने-पीने की चीजों के बढ़ते भाव और तेल की कीमतों में उछाल मिलकर आरबीआई के लिए सबसे कठिन परिस्थितियों में से एक बना देते हैं। इसकी वजह ये है कि इससे एक तरफ विकास की रफ्तार सुस्त होती है तो दूसरी तरफ महंगाई भी बढ़ती है। नितिन कामत का कहना है कि ऐसी स्थिति में आरबीआई चुप नहीं बैठ सकता और एक सीमा के बाद उसे ब्याज दरें बढ़ानी ही पड़ेंगी, और वहीं से खराब स्थिति संकट जैसी लगने लगती है।

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