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जेनेरिक मेडिसिन में कारोबार के हैं बेहतर मौके, महज 3 साल में इस आंत्रप्रेन्योर ने बनाई 500 करोड़ की कंपनी

16 साल के अर्जून देशपांडे ने महज 15 हजार के स्टार्टअप कैपिटल से जेनरीक आधार की नींव रखी लेकिन आज भारत की फार्मा इंडस्ट्री में कंपनी 8000-10000 लोगों को employment जनरेट कर रही है, और गरिबों तक किफायती दामों में दवाईयां मुहय्या कर पा रही है। फार्मा सेक्टर में इनोवेशन ला रहे इस यंग फाउंडर को रतन टाटा जैसे अनुभवी बिजनेसमैन और इन्वेस्टर का साथ मिला

MoneyControl Newsअपडेटेड Feb 25, 2023 पर 12:42 PM
जेनेरिक मेडिसिन में कारोबार के हैं बेहतर मौके, महज 3 साल में इस आंत्रप्रेन्योर ने बनाई 500 करोड़ की कंपनी
अर्जून के इस वेंचर को राज्य सरकारों का बढ़िया सपोर्ट मिल रहा है, हालही में उत्तर प्रदेश सरकार से 700 stores के लिए कंपनी MOU साइन कर चुकी है

दवाईं की दुकानों की तो कमी नहीं है देश में लेकिन गरीब के बुरे वक्त में यहां इंसानियत ढूंढना भगवान ढूंडने से कम नही होता है। एक बुजुर्ग इंसान को अपनी पत्नी के लिए दवाईयां खरीदते वक्त पैसों की कमी के चलते बेबस होते देख 16 साल के अर्जुन देशपांडे को झकझोर कर रख दिया। ,हार्ट, न्यूरोलॉजिकल या कैंसर जैसी बड़ी बिमारियों में दवाईयों का खर्च हर महीने 15-20 हजार तक जाता हो, तो एक माध्यम वर्गीय परिवार कैसे अपना इलाज करवाएं । क्या सच में दवाईयां इतनी महंगी है, अगर है तो क्यों है? ऐसे कितने लोग होंगे जो पैसों की कमी के चलते अपनी जान गवा देते होंगे, क्या है इस दिक्कत का कुछ समाधान निकल सकता है, क्या इस क्षेत्र में इनोवेशन लाया जा सकता है? इन सवालों से परेशान अर्जुन देशपांडे को इसका जवाब मिला जेनरीक मेडीसिन के रुप से तो सबसे पहले समझते है जेनेरिक मेडिसिन क्या होता है? और जेनेरिक दवा और ब्रांडेड दवा में क्या अंतर है? रिसर्च से बनाई मेडिसिन के पेंटेंट होते है, पेटेंट की एक्सपायरी के बाद उस फॉर्मुले से कोई भी मैन्यूफैक्चरर दवाईयां बना सकता है, जेनेरिक दवा वह दवा है जो बिना किसी पेटेंट के बनाई और distribute की जाती है। बड़ी फार्मा कंपनियां ब्रांडेड दवाईयां मनचाहे भाव पर बेचते है और वहीं जेनेरिक मेडिसिन सस्ते में बिकती है।

अर्जुन ने सोच लिया लगभग 80 % कम दामों की जेनेरिक मेडिसिन को आम आदमी की पहुंच में लाना है । pharmacy-aggregator model पर अर्जुन ने जेनरीक आधार pharma STARTUP की शुरूआत की, और महज 3 सालों में 150 शहरों में 2000 से ज्यादा फ्रैंचाइजी स्टोर्स शुरू हो चुके है। सस्ते और सबसिडरी मिलने वाले जनरीक मेडिसिन की आज देश में जरूरत है, भारत जेनेरिक दवाओं का दुनिया का दूसरा बड़ा उत्पादक है। 80% जेनेरिक दवाओं का उत्पादन करने के बावजूद अधिकतर एक्सपोर्ट होता आया है। इसलिए भारत में generic दवाईयाों की उपलब्धता आबादी की जरुरत के मुकाबले काफी कम थी। ऐसे में अर्जुन ने ना सिर्फ generic medical स्टोर शुरू किए बल्की इस कारोबार के लिए जरूरी इकोसिस्ट बनाने पर फोकस किया।

देश के हर आम आदमी तक पहुंच बनाने के मिशन पर निकले अर्जून ने जेनरीक आधार के स्टोर्स में लुक और डिजाइन से ज्यादा दवाईयों की availablity पर ध्यान दिया, साथ ही फ्रेंचाइजी को हर तरह का सपोर्ट देने पर कंपनी ने जोर दिया।

जेनरीक आधार की फ्रेंचाइजी को इन्वेंटरी की कमी कभी भी नहीं खलती क्योंकी कंपनी दवाईयों की मैन्यूफैक्चरिंग अपने ब्रांड के तहत करवा कर लेती है। कंपनी ने महज 3 साल में अपनी पहुंच बड़े शहरों के अलावा त्रिपुरा, झारखंड, उड़ीसा, बिहार जैसे राज्यों के इंटिरियर तक बनाई है, इस तेज तर्रार ग्रोथ के पिछे फाउंडर की मेहनत, जनरेकी मेडीसिन की जरुरत और उपलब्धता का अंदाजा लगाया जा सकता है। शुरू होने के बाद जेनरीक आधार का स्केल ऑर्गेनिक ग्रोथ से ही हुआ है क्योंकी आज का ग्राहक जागरूक है।

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