'सप्ताह में 70 घंटे काम'... इंफोसिस (infosys) के को-फाउंडर एनआर नारायणमूर्ति (NR Narayana Murthy) के इस बयान के बाद वर्क-लाइफ बैलेंस को लेकर चर्चा और बहस लगातार जारी है। बिजनेसमैन, स्टार्टअप्स फाउंडर, हेल्थ एक्सपर्ट आदि की ओर से कमेंट आना जारी है। अब Zerodha के को-फाउंडर निखिल कामत ने इस मामले पर अपने विचार रखे हैं। कामत ने इस सप्ताह की शुरुआत में CNBC TV18 के इंडिया बिजनेस लीडर्स अवॉर्ड्स 2023 में कहा, "समाजवादी झुकाव वाले नॉर्डिक या स्कैंडिनेवियाई देशों में 4 दिन के वर्क वीक को लेकर इतनी सारे उदाहरण हैं जो यह दिखाते हैं कि इकोसिस्टम का यह रूप, पूंजीवाद के जितना अच्छा काम नहीं करता है।"
उन्होंने कहा, "अगर हम सभी इस तथ्य से सहमत हैं कि पूंजीवाद ही आगे बढ़ने का रास्ता है, तो फिर कॉम्पिटीटिवनेस को संजोकर रखने की जरूरत है। हर किसी को हर किसी के साथ प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम होना चाहिए। अगर आप काम के घंटों की संख्या के आधार पर प्रतिस्पर्धा करना चाहते हैं, तो आपको यह करने में सक्षम होना चाहिए।"
कुछ दिन पहले इंफोसिस के पूर्व CFO मोहनदास पई के साथ ‘3वन4’ कैपिटल के पॉडकास्ट ‘द रिकॉर्ड’ के उद्घाटन एपिसोड में बातचीत के दौरान नारायण मूर्ति का बयान आया था कि देश की प्रोडक्टिविटी बढ़ाने के लिए, दिग्गज अर्थव्यवस्थाओं के साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए युवाओं को सप्ताह में 70 घंटे काम करना चाहिए। उन्होंने भारत की तुलना चीन, जापान और जर्मनी से करते हुए कहा था कि वर्क प्रोडक्टिविटी के मामले में भारत, दुनिया के सबसे कम प्रोडक्टिव देशों में से एक है। जब तक हम अपनी वर्क प्रोडक्टिविटी में सुधार नहीं करते, तब तक हम उन देशों के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएंगे, जिन्होंने बहुत अधिक प्रगति की है। इस बयान के बाद तरह-तरह के रिस्पॉन्स आने लगे और सोशल मीडिया पर एक बहस सी छिड़ गई। कोई नारायण मूर्ति के बयान के साथ दिखा तो कोई इसका विरोध करता नजर आया।
ब्याज दर व्यवस्था कैसे आ सकती है विकास संभावनाओं के आड़े
अवॉर्ड्स के दौरान निखिल कामत ने यह भी बताया कि कैसे ब्याज दर व्यवस्था, भारत की विकास संभावनाओं में बाधा डाल सकती है। उन्होंने कहा, “अमेरिका में ब्याज दरें 1,000-1,500 प्रतिशत बढ़ गई होंगी, लेकिन वे भारत में भी बढ़ी हैं। भले ही हमने अभी तक खपत पर इसका असर सही मायने में नहीं देखा है, लेकिन अगर ब्याज दरें इसी स्तर पर रहती हैं तो रियल एस्टेट से लेकर सभी क्षेत्रों में हम पूंजी की उच्च लागत देखेंगे, जिससे खपत में कुछ हद तक मंदी आएगी। मुझे लगता है कि अगर यह पहले से नहीं हो रहा है तो यह होना तय है। लेकिन जब तक हम बाकी दुनिया की तुलना में अपेक्षाकृत अच्छा प्रदर्शन करते रहेंगे, मुझे लगता है कि हम ठीक रहेंगे।''