पिछले कुछ दिनों में चने की कीमतों में तेजी आ रही है। नवरात्री, दशहरा और दिवाली में चना दाल और बेसन की डिमांड बढ़ जाती है जिसकी वजह चने के भाव में लगातार तेजी जारी है। मंडियों में फिलहाल नई फसल की आवक कम है जिससे भी सप्लाई पर प्रेशर बढ़ा है। इसके साथ ही कारोबारी और मिलें त्योहारों से पहले स्टॉक जमा कर लेते हैं जिससे भी सप्लाई कम हो जाती है और भाव बढ़ जाता है।
फेस्टिव सीजन में चना दाल और बेसन की महंगाई पर काबू पाने के लिए NAFED और सरकारी एजेंसियां बफर स्टॉक बनाने में जुटी हैं। इसके साथ ही म्यांमार और अफ्रीका से आने वाला चना इंपोर्ट महंगा हो गया है जिसका असर कीमतों पर साफ नजर आ रहा है।
सर्दियों का सीजन शुरू होते हुए चना और बेसन की कीमतों में तेजी आने लगती है जिसकी वजह से चने का भाव बढ़ने लगता है।
सिर्फ जीरो ड्यूटी से नहीं बनेगी बात
एग्री फार्मर्स एंड ट्रेड्स एसोसिएशन के सुनील बलदेव का कहना है कि इस साल हमें उड़द दाल का इंपोर्ट करना पड़ा क्योंकि देश में इसका स्टॉक नहीं था। उन्होंने कहा कि पहले उम्मीद थी कि उड़द की आगे आने वाली फसल अच्छी होगी लेकिन लगातार बारिश के कारण महाराष्ट्र और कर्नाटक में बाढ़ की स्थिति बनी हुई है वह चिंता का विषय है।
अगर तुअर दाल की बात करें तो अफ्रीकी देशों से आयात शुरू हो गया है। ये भी अच्छी बात है कि अब कीमतों में काफी नरमी आ गई है। पिछले साल जहां अफ्रीकी देश तुअर दाल 1000 से 1200 डॉलर के भाव पर बेचना चाहते थे लेकिन अब वो 550 डॉलर पर बेचने के लिए तैयार बैठे हैं।
देश को अपनी ताकत समझनी चाहिए
बलदेव ने कहा कि इसीलिए हम सरकार को बार बार ये कह रहे हैं कि हमें अपनी ताकत को समझना होगा। हमें सिर्फ ड्यूटी को जीरो करके बाहर के देशों से सस्ता दाल आयात नहीं करना चाहिए। हम ड्यूटी लगाकर भी बाहर के दालों की कीमतों को काबू में रख सकते हैं। तुअर दाल के इंपोर्ट में सरकार को सोच-समझकर पॉलिसी बनानी होगी। सिर्फ जीरो ड्यूटी करके कीमतों पर नियंत्रण रखने की पॉलिसी गलत है।
अगर चने की बात करें तो पिछले साल हमने चने का इंपोर्ट 750 डॉलर प्रति टन पर किया। लेकिन आज 570 डॉलर के भाव पर ऑस्ट्रेलिया और 630 डॉलर के भाव पर तंजानिया चना बेचने को तैयार है। हमें ऐसी पॉलिसी बनानी होगी कि किसानों और कंज्यूमर दोनों को फायदा हो।